यार मेरा भी कुछ हक़ है . . .

अनिल शर्मा, सिवनी

यार मेरा भी कुछ हक़ है
ग़र तुम गला काट रहे हो
मैं उसका हाथ काट लू
कोई पैर काट ले
कोई के हिस्से में उसका जिगर
कोई उसकी किडनी
तो कोई ख़ून बेच खाये
वो बेचारा कुछ न कर पायेगा
क्योकि उसे तो बस
थोड़ा सा मर मर के जीना आता है
या वो जीते जी मरा सा रहता है
उसे बरगला के
कभी ये तो कभी वो
बुद्धिमान बनाये रखते है
उसके तवे पे रोटी
सबकी सिकती रहती है
कभी शकुनि की सियासत
कभी कृष्ण का दुलार
पर उसको कोई फर्क
नही पड़ता मेरे यार
क्योकि वो नही
बनता कभी भी गद्दार
क्योकि
वो है सच्चे देश की
सच्ची बफादार जनता
एक अलम्बरदार