अशोक चव्हाण जैसे नेताओं पर क्या राय है कांग्रेस आलाकमान की . . .

लिमटी की लालटेन 602

कांग्रेस के लिए कहीं बज तो नहीं चुकी है खतरे की घंटी . . .

(लिमटी खरे)

महाराष्ट्र प्रदेश की राजधानी और देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में इन दिनों जो कुछ हो रहा है, वह नाटकीय तो माना जा सकता है किन्तु कांग्रेस के लिए वह किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं माना जा सकता है। कांग्रेस के कद्दावर नेता एक के बाद एक जिस तरह कांग्रेस की वर्तमान विचारधारा को छोड़कर जा रहे हैं उस पर विचार की आवश्यकता महसूस हो रही है। ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो कांग्रेस के आला नेता राहुल गांधी को कुछ गलत सलाहकारों ने घेर लिया हो।

इस साल अप्रैल या मई माह में आम चुनाव होने हैं। 2014 से लगातार ही भाजपा सत्ता में है तो देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस विपक्ष में बैठी है। इस बार अगर कांग्रेस को सफलता हासिल नहीं होती है तो आने वाला समय कांग्रेस के लिए बहुत ही कष्टकारी साबित हो सकता है। जिस तरह से कांग्रेस के नेताओं का कांग्रेस पार्टी से मोहभंग हो रहा है वह अच्छे संकेत तो कतई नहीं माने जा सकते हैं। एक के बाद एक करके कांग्रेसी नेता पार्टी से त्यागपत्र दे रहे हैं और अन्य दलों की ओर रूख कर रहे हैं।

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सोमवार को महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने कांग्रेस पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से त्यागपत्र दिया। सियासी गलियारों में यह चर्चा चल रही थी कि वे भाजपा में शामिल हो जाएंगे। हुआ भी वही, मंगलवार को अशोक चव्हाण भाजपा के हो गए। उनके साथ एमएलसी अमर राजुलकर ने भी भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। माना जा रहा है कि अशोक चव्हाण के भाजपा में जाने के बाद कुछ और विधायक कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जा सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो कांग्रेस के खाते में इस बार महाराष्ट्र से राज्य सभा का कलश रीता ही रह सकता है। जिस तरह भाजपा के द्वारा 2022 में 10 जून को महाराष्ट्र में राज्यसभा की एक अन्य सीट पर विजय हासिल की गई थी, उस इतिहास को इस बार एक बार फिर दोहराया जा सकता है।

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने पहचान उजागर न करने की शर्त पर समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया से चर्चा के दौरान कहा कि अशोक चव्हाण को राज्य सभा के जरिए केंद्र की राजनीति में भेजे जाने का ताना बाना ही अशोक चव्हाण के कांग्रेस से मोहभंग का आधार बना। अगर ऐसा है तो इसका सीधा तातपर्य यही हुआ कि अशोक चव्हाण ने इसके पहले कांग्रेस के आला नेताओं को राज्य सभा से जाने की मंशा से आवगत कराया होगा। अशोक चव्हाण जैसे नेता को कम से कम लोकसभा चुनावों तक कांग्रेस में रोक कर रखा जाना चाहिए था, इसके लिए उन्हें राज्य सभा से भेजा जा सकता था। अब बाजी कांग्रेस के हाथ से निकल चुकी है।

महाराष्ट्र प्रदेश में राज्य सभा का गणित सीधा सा है। वर्तमान में 06 सीट रिक्त हुई हैं। इनमें आधी अर्थात 03 पर तो भाजपा जीत के लिए कंर्फटेबल पोजीशन में है। इसके अलावा एक सीट अजित पवार वाली एनसीपी और एक शिंदे सेना के खाते में अगर जाती है तो भाजपा को शायद ही इससे कोई आपत्ति हो। इसके अतिरिक्त एक सीट पर कांग्रेस परचम लहरा सकती थी। अब अशोक चव्हाण भाजपा में आ चुके हैं एवं उनके समर्थक विधायक भी भाजपा में आ जाते हैं तो उस सीट पर जिस पर कांग्रेस विजयी हो सकती थी, वहां अशोक चव्हाण को मैदान में उतारकर भाजपा एक तीर से अनेक निशाने भी साध सकती है।

कांग्रेस से नेताओं का मोहभंग आखिर क्यों हो रहा है। यह जानते हुए भी कि भारतीय जनता पार्टी काडर बेस्ड पार्टी है और वहां की रीति नीति, कार्यप्रणाली आदि कांग्रेस से बहुत भिन्न है के बावजूद भी कांग्रेस से भाजपा की ओर रूख करने नेताओं के नाक तक पानी आ चुका होगा, वरना कांग्रेस छोड़ने की बात ये नेता सपने में भी नहीं सोचते। कांग्रेस आलाकमान के सलाहकार जब तक अहमद पटेल रहे तब तक काफी हद तक समन्वय बना दिखाई देता था, पर अब तो कांग्रेस के नेता राहुल गांधी अगर स्पष्ट तौर पर यह कह रहे हों कि जिसे कांग्रेस छोड़कर जाना हो जाए, जिसे रहना हो रहे …, तो इसे क्या समझा जाए!

सियासी गलियारों में राहुल गांधी की इस बात को इस तरीके से लिया जा रहा है हो कि कांग्रेस के आला नेताओं को अब कार्यकर्ताओं की दरकार नहीं है, कार्यकर्ताओं को पार्टी की दरकार है! तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। पता नहीं राहुल गांधी के सलाकार कौन हैं और वे जो भी सलाह राहुल गांधी को दे रहे हैं उन मशविरों पर बिना विचार किए ही राहुल गांधी अमल में ला रहे हैं जो बहुत ही घातक माना जा सकता है। ऐसे में कांग्रेस का जहाज धीरे धीरे खाली होता जाएगा।

पिछले एक दशक का अगर रिकार्ड देखा जाए तो अशोक चव्हाण कांग्रेस के नौवें मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने कांग्रेस को अलविदा कहा है। अब तक कांग्रेस छोड़कर भाजपा में दस मुख्यमंत्री शामिल हुए हैं, जिसमें से महज एक ही ने कांग्रेस की ओर रूख करके घर वापसी की है। अशोक चव्हाण मराठवाड़ा क्षेत्र के बड़े नेता माने जाते हैं और मराठवाड़ा में उनका खासा प्रभाव भी है। अशोक चव्हाण को अगर राज्य सभा से नहीं भेजा जाता तो उन्हें नांदेड़ सीट से एक बार फिर लोकसभा में उतारा जा सकता है।

अशोक चव्हाण को राज्य सभा से भेजा जाएगा या लोकसभा में उनको उतारा जाएगा यह फैसला तो आलाकमान के पास सुरक्षित हो चुका होगा, पर एक बात तय है कि महाराष्ट्र की सियासत में अशोक चव्हाण एक बड़ा नाम है और लोकसभा में महाराष्ट्र की 48 सीटों में से कम से डेढ़ दर्जन से ज्यादा सीटों पर अशोक चव्हाण का उपयोग भाजपा कर सकती है। अशोक चव्हाण, बाबा सिद्दकी और मिलिंद देवड़ा के द्वारा कांग्रेस को अलविदा कहने से इस सूबे में कांग्रेस अब आईसीयू में दिखाई देने लगे तो किसी को आश्चय्र नहीं होना चाहिए क्योंकि इन तीनों के बाद अन्य नेताओं को इससे बल मिलेगा और वे भी पार्टी को टाटा बाय बाय कहने का साहस जुटा सकते हैं।

देखा जाए तो यह पहली दफा नहीं हुआ है जबकि कांग्रेस को आम चुनावों के पहले इस तरह का झटका सहना पड़ा हो। जम्मू काश्मीर के मुख्यमंत्री रहे गुलाम नबी आजाद कांग्रेस से अलग हुए तो पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू से अनबन के चलते पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस को अलविदा कहा था। कर्नाटक के निजाम रहे एस.एम. कृष्णा, तो छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रहे अजीत जोगी, उत्तराखण्ड के सीएम रहे विजय बहुगुणा, ओडीसा के सीएम गिरधर गोमांग, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे नारायण राणे के बाद पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण कांग्रेस को छोड़कर चले गए हैं। इसमें से गिरधर गोमांग ही इकलौते रहे हैं जो पार्टी में वापस लौटे थे।

बहरहाल, राज्य सभा चुनावों के नामांकन के लिए ब्रहस्पतिवार 15 फरवरी तक नामांकन दाखिल करना अनिवार्य है। महाराष्ट्र सूबे की अगर बात की जाए तो महाराष्ट्र में कुल 285 विधायक हैं, इस लिहाज से राज्य सभा के प्रत्येक प्रत्याशी को 42 वोट की दरकार होगी। इंडिया गठबंधन की अगर बात की जाए तो सूबे में उसके पास 44 विधायक हैं। शिवसेना के उद्धव गुट के हाथ में 16 तो शरद पवार के पास 11, एनडीए में भाजपा के पास 104, शिंदे के हाथ में 39 और अजित पवार के पास 44 विधायक हैं। तस्वीर 15 फरवरी के बाद काफी हद तक साफ होने की उम्मीद है।

यक्ष प्रश्न यही है कि कांग्रेस सत्ता में नहीं रहेगी तो कार्यकर्ताओं के उदर पोषण के लिए व्यवस्थाएं कैसे हो पाएंगी। यह बात जग जाहिर है कि जब जिस पार्टी की सरकार होती है तब उस पार्टी के कार्यकर्ताओं को घोषित या अघोषित तरीके से काम मिलता है और कहीं न कहीं यह उनके आजीविकोपार्जन का आधार भी बन जाता है। केंद्र में 10 सालों से कांग्रेस सत्ता से बाहर है। राज्यों में भी अगर देखा जाए तो हिमाचल प्रदेश में सुखविंदर सिंह, तेलंगाना में रेवन्थ रेड्डी एवं कर्नाटक में सिद्धरमैया के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार है। कांग्रेस के आला नेताओं को विचार करना होगा कि दस सालों में आखिर ऐसी कौन सी नीतियों उनके द्वारा अपनाई गईं कि 29 में से सिर्फ 03 राज्यों वह भी अपेक्षाकृत छोटे राज्यों तक कांग्रेस सिमटकर रह गई है।

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(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)

(साई फीचर्स)

 

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