सख्त कानूनी प्रावधान नहीं रोक पाए अपराधों को तो चुनावों में धांधलियों को कैसे रोका जा सकता है महज आचार संहिता के भरोसे!

लिमटी की लालटेन 647

क्या सिर्फ आचार संहिता प्रभावी करने से ही हो सकता है चुनाव सुधार या उठाने होंगे अप्रिय व कठोर कदम!

(लिमटी खरे)

देश में आम चुनाव चल रहे हैं। इस समय आचार संहिता उल्लंघन की खबरों से मीडिया पटा पड़ा है। कमोबेश हर संसदीय क्षेत्र में आचार संहिता उल्लंघन की शिकायतें आम हुआ करती हैं। कुछ मामलों में इन पर कार्यवाही भी की जाती है। यह आम धारणा बन चुकी है कि चुनाव के दौरान आचार संहिता उल्लंघन की शिकायतें लगातार की जाएं और अगर प्रत्याशी पराजित होता है तो वह जब इस मामले में माननीय न्यायालय में जाएगा तब इन शिकायतों की पावती उसके लिए सपोर्टिंग डाक्यूमेंट साबित हो सकते हैं।

देश में चुनावों के दौरान की गई आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायतों की अगर बात की जाए तो कब कब अचार संहिता के उल्लंघन की कार्यवाहियों का विवरण मिलता है, जाहिर है इस तरह के उदहारण नगण्य के बराबर ही माने जा सकतेे हैं। हाल ही में चल रहे आम चुनावों में हर रोज किसी न किसी नेता के खिलाफ आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायतें प्रकाश में आ रही हैं। इन शिकायतों की अद्यतन स्थिति क्या है। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ भी आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायत चुनाव आयोग से किए जाने के आठ दस दिन बाद भी नतीजा फिर ही है।

केंद्रीय चुनाव आयोग जिसका शार्ट फार्म सोशल मीडिया पर लोग केचुआ भी निरूपित करते हैं के पास कमोबेश हर चुनाव में प्रधानमंत्री हों सत्ताधारी दल के बड़े नेता या विपक्ष के नेता, हर किसी के बारे में शिकायतें मिला करती रही हैं। इन शिकायतों पर केचुआ की चुप्पी भी सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक ही मानी जा सकती है। जानकारों का कहना है कि जब भी किसी भी दल के स्टार प्रचारक के द्वारा जहर उगलते हुए आचार संहिता का उल्लंघन किया जाता रहा है तब तब चुनाव आयोग के द्वारा पार्टियों के अध्यक्षों को नोटिस भेजा जाता है। इसका जवाब आते आते चुनाव संपन्न हो जाते हैं और उसके बाद सब कुछ ठण्डे बस्ते के हवाले ही कर दी जाती है।

वर्तमान हालातों में प्रधानमंत्री के मामले में भाजपा के अध्यक्ष और कांग्रेस के मामले में कांग्रेस के अध्यक्ष को नोटिस भेजा गया है। कांग्रेस के द्वारा तो जवाब भेज दिया गया है, पर भाजपा ने जवाब देने के लिए समय मांग लिया है। जानकार यह भी बताते हैं कि इस तरह के मामलों में कार्यवाही किस पर की जा सकती है! आचार संहिता के उल्लंघनकर्ता पर अथवा दल के अध्यक्ष पर! जानकारों ने इस बात के संकेत भी दिए हैं कि राहुल गांधी के खिलाफ अगर शिकायत सही मिलती है तो संभवतः पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे या प्रधानमंत्री के खिलाफ शिकायत सही पाई जाती है तो भाजपाध्यक्ष जेपी नड्डा को 24 या 48 घंटों के लिए भाषण देने से रोका जा सकता है। जानकार यह भी कहते हैं कि चुनाव आयोग को अधिकर संपन्न नहीं बनाया गया है। संभवतः यही कारण है कि प्रत्याशियों या सियासी दलों के द्वारा आचार संहिता का पालन करने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं ली जाती है।

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में 14 सितंबर 2022 को कहा था कि फिलहाल हेट स्पीच से संबंधित देश में कोई स्पष्ट और सीधा कानून नहीं है। सुप्रीम कोर्ट को इस तरह के मामलों को रोकने के लिए आदेश पारित करना चाहिए। आयोग ने देश की सर्वाेच्च अदालत को यह भी बताया था कि असल में चुनावी मैदान में उतरे किसी भी उम्मीदवार को उस समय तक नहीं रोका जा सकता, जब तक की हेट स्पीच को परिभाषित करते हुए स्पष्ट कानून ना हो। इस मामले में लॉ कमिशन द्वारा दी गई 267 वीं रिपोर्ट में भी कहा गया था कि हेट स्पीच को लेकर जरूरी संशोधन की जरूरत है।

इस तरह के हालातों में अब यक्ष प्रश्न यही खड़ा दिखता है कि आखिर आचार संहिता क्या महज औपचारिकता के लिए ही है! जब आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायतें आम हैं, आचार संहिता का उल्लंघन सरे आम होता है और जब चुनाव आयोग को दाखिल किए जाने वाली जानकारियों में सब कुछ नियमानुसार ही होता है तब इसे क्या माना जाए! चुनाव आयोग के निमय कायदों की परवाह किसे नजर आती है! आदर्श आचरण संहिता के तहत कहा जाता है कि उम्मीदवार तीन से ज्यादा वाहन लेकर नामांकन दाखिल करने नहीं जाएंगे, पर क्या यह वास्तव में होता है! कितने वाहनों का काफिला होता है उम्मीदवार के नामांकन में! देखा जाए तो यह एक तरह का शक्ति प्रदर्शन ही होता है।

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इसी तरह लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में 95 लाख रूपए खर्च करने की सीमा तय की गई है। उम्मीदवार के द्वारा हर दिन के खर्च का ब्योरा रखा जाता है और कई बार तो प्रत्याशियों के द्वारा महज 10 लाख रूपए के अंदर ही चुनाव लड़ना बता दिया जाता है, पर क्या यह सही होता है। जाहिर है यह सब महज खानापूर्ति ही कहा जा सकता है। चुनावों के द्वारा पैसा जिस तरह पानी के मानिंद बहाया जाता है उसे क्या कहा जाएगा। क्या इस तरह दस पांच लाख रूपए खर्च किए जाने का ब्यौरा कागजों पर देकर चुनाव में करोड़ों फूंकने पर कोई नजर रख रहा है। चुनाव के दौरान व्यय पर्यावेक्षक आखिर क्या देखते हैं!

चुनावों के दौरान आचार संहिता का विकल्प क्या हो, जिससे इन सब पर प्रतिबंध लग सके, यह सोचने की आज महती जरूरत है। इसके लिए मार्ग प्रशस्त करने होंगे। देश को, प्रदेश को, समाज को, हर जगह को पारदर्शी और स्वच्छ बनाने की दिशा में प्रयास करने की जरूरत आज महसूस होने लगी है। अगर सब कुछ सीमाओं में बांध दिया जाएगा तो अच्छे और ईमानदार लोगों की तादाद राजनीति में बढ़ सकती है। जब देश के संविधान को, कानून को, नैतिकता को, चरित्र आदि को ही सर्वोपरि मान लिया जाएगा तब देश में आचार संहिता की आवश्यकता शायद नहीं पड़े।

कहा जाता है कि सख्त से सख्त कानून भी अपराधों की रोकथाम के लिए सक्षम नहीं है। अरब देशों के कानून सख्त होने के बाद भी अपराध वहां भी होते हैं, यह अलहदा बात है कि अन्य देशों के मुकाबले वहां अपराध कम तादाद में होते हैं। इस सबके लिए देश में चुनाव सुधार पर देश व्यापी बहस की महती जरूरत है, ताकि चुनाव के दौरान लाखों, करोड़ों फंूकने, मतदाताओं को अपने पक्ष में करने, अपने पक्ष में माहौल बनाने आदि के लिए जहर उगलने वाली जुबानों पर लगाम लगाने के मार्ग प्रशस्त किए जा सकें।

(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)

(साई फीचर्स)