जानिए कायस्थ समुदाय के चार धामों के बारे में विस्तार से . . .
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सृष्टि से रचयिता भगवान ब्रम्हा जी की काया से उतपन्न हुए न्याय के देवता धर्मराज भगवान चित्रगुप्त महाराज के वैसे तो देश भर में अनेक देवालय हैं, परन्तु इनमें से पौराणिक एवं एतिहासिक महत्व के प्रथम चार मंदिर, कायस्थों के चार धामों के समतुल्य महत्व रखते हैं। ये महत्वपूर्ण और प्रसिद्व तो हैं ही, प्रश्न है हमारी आस्था और विश्वास का है। देश में चार स्थानों के देवालयों को कायस्थ समुदाय के चार धाम के रूप में जाना जाता है। आईए आज हम आपको इन चारों धाम के बारे में बताते हैं विस्तार से . . .
अगर आप भगवान श्री चित्रगुप्त महाराज जी की अराधना करते हैं और अगर आप भगवान श्री चित्रगुप्त महाराज जी के भक्त हैं तो कमेंट बाक्स में जय चित्रगुप्त देवा, जय श्री चित्रगुप्त महाराज लिखना न भूलिए।
देश के हृदय प्रदेश, मध्य प्रदेश के प्राचीन उज्जयनी शहर जो अब उज्जैन के नाम से जाना जाता है इस उज्जैन जिले के अंकपात में स्थित शिला मंदिर के बारे में सबसे पहले जानते हैं। पौराणिक आख्यानों के अनुसार मान्यता है कि कायस्थों के आदि पूर्वजन्याय के देवता धर्मराज भगवान चित्रगुप्त महाराज का प्रादुर्भाव, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को, पौराणिक अवनितका अथवा उज्जयिनी के अंक पात क्षेत्र में हुआ था। यहीं पर उन्होंने देव गुरु बृहस्पति तथा दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य से सभी शिक्षायें प्राप्त करके, धर्मराज के सहायक का पदभार ग्रहण किया था।
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पदमपुराण के सृषिट खंड में आख्यान है कि सृषिट की रचना के समय उत्पन्न तमाम जीवधारियों के कर्मानुसार फल देने का दायित्व, विवस्वान पुत्र यम को, जिन्हें धर्मराज की उपाधि से भी विभूषित किया गया था, को दिया गया था। उज्जैन, जहा सिंहस्थ सूर्य के कुम्भ के आयोजन के लिये जाना जाता है, वहीं शिव के चौदह ज्योतिर्लिगों में से एक महाकालेश्वर (महाकाल) के पावन मंदिर के लिये, हिंदू संस्कृति में एक महत्वपूर्ण स्थान भी रखता है।
उत्तर वैदिक और पौराणिक इतिहास में दक्षिणा के पथ पर सिथत होने के कारण उज्जैन एक प्राचीन व्यापारिक केन्द्र के रुप में भी प्रसिद्व था। क्षिप्रा नदी के तट पर सिथत, अवनितका अथवा उज्जयिनी (वर्तमान उज्जैन) भारतीय पुराणों में एक पवित्र मोक्षदाता तीर्थ बताया गया है और अंकपात क्षेत्र, जहां न्याय के देवता धर्मराज भगवान चित्रगुप्त महाराज ने तपस्या करके सर्वज्ञता की थी, उज्जैन नगर से लगभग 12 किलो मीटर उत्तर दिशा में सिथत है। सन 1985 ईस्वी में क्षिप्रा नदी के किनारे, इसी अंकपात के वन क्षेत्र में एक चौकोर शिला स्थापित थी जिसके एक ओर संभवतः धर्मराज यमराज महाराज और दूसरी ओर न्याय के देवता धर्मराज भगवान चित्रगुप्त महाराज के चित्र उकेरे हुए थे।
दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश के फैजाबाद की राम नगरी अयोध्या का चित्रगुप्त धाम आता है। यहां श्री धर्मिहरि चित्रगुप्त मंदिर है। श्री धर्महरि चित्रगुप्त मंदिर वर्तमान में, सरयू नदी के दक्षिण, नयाघाट से फैजाबाद, राजमार्ग पर सिथत तुलसी उद्यान से लगभग 500 मीटर पूर्व दिशा में, डेरा बीबी मोहल्ले में, बेतिया राज्य के मंदिर के निकट है। वैसे नयाघाट से मंदिर की सीधी दूरी लगभग एक किलो मीटर मानी जा सकती है। पौराणिक गाथाओं के अनुसार, स्वंय भगवान विष्णु ने इस मंदिर की स्थापना की थी और धर्मराज जी को दिये गये वरदान के फलस्वरुप ही धर्मराज जी के साथ इनका नाम जोड़ कर इस मंदिर को श्री धर्म हरि मंदिर का नाम दिया है।
श्री अयोध्या महात्मय में भी इसे श्री धर्म हरि मंदिर कहा गया है। किवदंति है कि विवाह के बाद जनकपुर से वापिस आने पर श्रीराम सीता ने सर्वप्रथम धर्महरि जी के ही दर्शन किये थे। धार्मिक मान्यता है कि अयोध्या आने वाले सभी तीर्थयात्रियों को अनिवार्यतः श्री धर्म हरि जी के दर्शन करना चाहिये, अन्यथा उसे इस तीर्थ यात्रा का पुण्यफल प्राप्त नहीं होता। अयोध्या के इतिहास में उल्लेख है कि सरयू के जल प्रलय से अयोध्या नगरी पूर्णतया नष्ट हो गई थी और विक्रमी संवत के प्रवर्तक सम्राट विक्रमादित्य ने जब अयोध्या नगरी की पुनर्स्थापना की तो सर्वप्रथम श्री धर्म हरि जी के मंदिर की स्थापना कराई थी।
इसके बाद आता है तीसरे धाम का स्थान। तमिलनाडु के कांचीपुरम (पौराणिक कांचीपुरी) का श्री चित्रगुप्त स्वामी मंदिर तीसरे धाम के रूप में प्रसिद्ध है। दक्षिण भारत के तमिल ग्रन्थ करणीगर पुराणम के साथ ही विष्णु धर्माेत्तर पुराण में भी श्री चित्रगुप्त स्वामी के नाम से ज्ञात न्याय के देवता धर्मराज भगवान चित्रगुप्त महाराज के वशंज माने गये करुणीगर कायस्थों का उल्लेख मिलता है। इन्हीं श्री चित्रगुप्त स्वामी का एक भव्य मंदिर, मंदिरों की नगरी काचीपुरम में नगर के मध्य में सिथत है।
दक्षिण भारत के तमिल क्षेत्र में इन करणीगरों की मान्यता वैसी ही है जैसी उत्तर भारत के बारह चित्रगुप्तवंशी कायस्थों की। परन्तु, करुणीगर पुराणम के अनुसार श्री चित्रगुप्त स्वामी एक नीला देवी से भगवान सूर्य के पुत्र हैं। श्री चित्रगुप्त स्वामी का मंदिर, काचीपुरम नगर के मध्य में, श्री रामकृष्ण आश्रम से लगभग एक फर्लांग जो एक मील का आठवां भाग होता है अथवा लगभग चौथाई किलोमीटर माना जा सकता है की दूरी पर एक ऊॅचे चबूतरे पर सिथत है। यह चबूतरा इतना ऊॅचा है कि कोई भी दर्शनार्थी नीचे खड़े होकर, मंदिर के गर्भगृह में स्थापित मूर्ति के दर्शन नहीं कर सकता, उसे चबूतरे पर ऊपर चढ़ने के बाद ही श्री चित्रगुप्त स्वामी के दर्शन प्राप्त हो सकते हैं। मंदिर का स्थापत्य बहुत सुन्दर, भव्य और गरिमामय है। मंदिर के गर्भ गृह में, हाथों में कलम दवात लिये हुये भगवान चित्रगुप्त स्वामी के साथ ही देवी कार्नकी की कास्य प्रतिमा स्थापित है।
इसी क्रम में चौथा धाम बिहार के पटना सिटी के दीवान मोहल्ले में, नौजरघाट सिथत श्री चित्रगुप्त आदि मंदिर पटना मगघ की प्राचीन राजधानी पाटलिपुत्र तथा बिहार राज्य के आधुनिक मुख्यालय पटना में, पतित पावनी गंगा के तट पर, दीवान मोहल्ला के नौजरघाट पर सिथत इस ऐतिहासिक चित्रगुप्त मंदिर को पटना के कायस्थों ने श्री चित्रगुप्त आदि की संज्ञा क्यों दी? यह स्पष्ट नहीं किया गया है।
बताया जाता है कि सर्वप्रथम इस मंदिर का निर्माण, नंद वंश के अंतिम मगध सम्राट धनानन्द ने इतिहास प्रसिद्व महामंत्री, चित्रगुप्तवंशी राक्षस ने ईसा पूर्व कराया था। यह भी कहा जाता है कि इस मंदिर का पुर्ननिर्माण, मुगल सम्राट के नौरत्नों में से एक और वर्तमान जिला औरंगाबाद के मूल निवासी और इतिहास प्रसिद्व शेरशाह सूरी के भी मंत्री रह चुके, राजा टोडरमल तथा उनके नायब रहे कुवर किशोर बहादुर ने करवाकर, कसौटी पत्थर की न्याय के देवता धर्मराज भगवान चित्रगुप्त महाराज की मूर्ति, हिजरी सन 980 तदानुसार ईसवीं सन 1574 में स्थापित कराई थी।
ईसवीं सन 1766 में राजा सिताबराय ने मंदिर के चारों ओर की भूमि, मंदिर के नाम करवाकर चार दीवारी बनवाई थी। बाद में राजा सिताबराय के पौत्र, महाराज भूपनारायण सिंहं ने, जयपुर से मंगवाये गये, नक्काशीदार पत्थरों से मंदिर को भव्यता प्रदान की थी। परन्तु देख रेख के अभाव में, मंदिर जीर्ण शीर्ण ही नहीं हो गया, वरन मंदिर में स्थापित कसौटी पत्थर की मूर्ति तस्करों द्वारा चुरा ली गई थी। तत्पश्चात संवत 2019, तदानुसार ईसवीं सन 1962 में, पटना सिटी निवासी, चित्रगुप्तवंशी राजा रामनारायण वंशज राय मथुरा प्रसाद जी ने मंदिर में, स्फटिक पत्थर की मूर्ति स्थापित करवाकर, मंदिर को मंदिर की प्रतिष्ठा दिलाई थी। यही प्रतिमा 11 नवंबर 2007 तक इस मंदिर में शोभायमान थी। इस मंदिर में एक शिव मंदिर भी है। अव्यवस्था के कारण अराजक तत्वों ने उपेक्षित मंदिर परिसर पर अवैध कब्जा करके परिसर को बहुत छोटा कर दिया था।
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