जानिए क्या क्या होता आया है फाल्गुन अथवा फागुन माह में!
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फागुन जिसे संस्कृत एवं रोमन में फाल्गुन कहा जाता है दरअसल, हिंदू कैलेंडर का एक महीना है। भारत के राष्ट्रीय नागरिक कैलेंडर में, फाल्गुन वर्ष का बारहवाँ महीना है और ग्रेगोरियन कैलेंडर में फरवरी/मार्च के अनुरूप है। लूनी-सौर कैलेंडर में, फागुन वर्ष के एक ही समय के आसपास अमावस्या या पूर्णिमा पर शुरू हो सकता है और यह वर्ष का बारहवाँ महीना होता है। हालाँकि, गुजरात में, कार्तिक वर्ष का पहला महीना होता है, और इसलिए गुजरातियों के लिए फागुन पाँचवाँ महीना होता है। होली (अमंता प्रणाली में 15 फागुन/पूर्णिमांत प्रणाली में 30 फागुन) और महा शिवरात्रि (पूर्णिमांत प्रणाली में 14 वाँ फागुन) की छुट्टियाँ इसी महीने में मनाई जाती हैं। यह विक्रम संवत कैलेंडर में फागुन वर्ष का ग्यारहवाँ महीना है।
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सौर धार्मिक कैलेंडर में, फा गुण सूर्य के मीन राशि में प्रवेश के साथ शुरू होता है और यह सौर वर्ष का बारहवां महीना होता है। वैष्णव कैलेंडर में, गोविंदा इस महीने के स्वामी हैं। संत चौतन्य महाप्रभु (1486 से 1534) के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाने वाली गौर-पूर्णिमा भी इसी महीने में पड़ती है।
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फाल्गुन मास या फाल्गुन मासम के नाम से भी जाना जाने वाला फाल्गुन महीना पारंपरिक हिंदू कैलेंडर में 12वां और अंतिम महीना है। उत्तर भारतीय हिंदू कैलेंडर के अनुसार, 2025 में फाल्गुन महीना 13 फरवरी से शुरू होकर 14 मार्च को समाप्त होगा। इस कैलेंडर का पालन उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे क्षेत्रों में किया जाता है।
हालाँकि, तेलुगु, मराठी, कन्नड़ और गुजराती कैलेंडर के अनुसार, फाल्गुन मास 28 फरवरी से शुरू होकर 29 मार्च 2025 को समाप्त होगा। यह अंतर इसलिए उत्पन्न होता है क्योंकि क्षेत्रीय कैलेंडर महीने की गणना थोड़े अलग तरीके से करते हैं।
इस माह में मनाए जाने वाले समारोहों के बारे में जानिए,
उत्तर भारत के अधिकांश भागों में इस महीने में प्रसिद्ध हिंदू त्यौहार होली का प्रारंभिक उत्सव मनाया जाता है। होली सर्दियों के मौसम के अंत में चंद्र महीने फाल्गुन या फाल्गुन पूर्णिमा के अंतिम पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है, जो आमतौर पर फरवरी या मार्च के उत्तरार्ध में आती है।
हिंदू त्योहार शिग्मो भी गोवा और कोंकण में फाल्गुन के महीने में मनाया जाता है। उत्सव एक महीने तक चल सकता है और हिंदू लूनी-सौर नववर्ष शुरू होने के बाद भी चल सकता है। राजस्थान के खाटू श्याम महाराज जी में फाल्गुन मेला एक और लोकप्रिय मेला है।
फाल्गुन मेला खाटू श्याम मंदिर और श्याम मंदिर भाटली से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है। यह त्यौहार होली के त्यौहार से 8 या 9 दिन पहले होता है। बर्बरीक महाराज का सिर फाल्गुन शुद्ध एकादशी को प्रकट हुआ था, जो हिंदू महीने फाल्गुन के शुक्ल पक्ष के 11वें दिन होता है। मेला शुरू में उस महीने की 9वीं से 12वीं तारीख तक आयोजित किया जाता था, बाद में फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष के लगभग 12 से 15 दिनों तक बढ़ा दिया गया बताया जाता है।
देश भर से श्रद्धालु हाथों में निशान जिसे पवित्र निशान या ध्वज कहा जाता है, लेकर आते हैं। लोग श्याम भजन गाकर और विभिन्न संगीत वाद्ययंत्र बजाकर अपनी पवित्र यात्रा को चिन्हित करते हैं। वे गुलाल से होली खेलते हैं। कई श्याम भक्त टेंट की छाया में पदयात्रियों को भोजन कराते हैं। वे इस अवसर को खाटूश्यामजी के विवाह के रूप में मनाते हैं। द्वादशी अर्थात महीने का 12वां दिन को बाबा की प्रसादी के रूप में खीर और चूरमा का भोग तैयार किया जाता है। दो प्रसिद्ध फाल्गुन मेले खाटूश्याम राजस्थान और भटली ओडिशा से हैं।
जानिए कि क्या चन्द्रमा का जन्म फाल्गुन मास में हुआ था,
मान्यताएं हैं, चन्द्रमा की उत्पत्ति ऋषि अत्री और देवी अनसुईया से फाल्गुन मास की पूर्णिमा को हुई थी। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सभी प्राणियों के मन का नियंत्रण चन्द्रमा के द्वारा किया जाता है। चन्द्रमा मन में विचार उत्पन्न करता है, मनुष्य के उत्थान-पतन का कारण मानव मन ही है, जो चन्द्रमा के अधिकार क्षेत्र में आता है, इसलिए फाल्गुन मास में चन्द्रमा का उपाय, शिव जी की पूजा और होलिकोत्सव मन की विकृतियों से व्यक्ति की रक्षा करती है। फाल्गुन मास में मन की चंचलता पर नियंत्रण के लिए विधि-विधान बनाए गए हैं। फाल्गुन मास में भगवान श्रीकृष्ण जी, भगवान विष्णु जी, माता जानकी, भगवान शिव जी के साथ-साथ चन्द्रदेव जी की पूजा का विशेष महत्व होता है। फाल्गुन मास के दौरान कई त्योहार मनाए जाते हैं जिसमें होली, महाशिवरात्रि, फुलेरा दूज, फाल्गुन पूर्णिमा, फाल्गुन अमावस्या और आमलकी एकादशी प्रमुख हैं।
फाल्गुन कृष्ण पक्ष की एकादशी विजया एकादशी कहलाती है। मानसिक संताप दूर करने एवं सात्विकता बनाए रखने के लिए विजया एकादशी का व्रत रखने की परम्परा है।
फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी महाशिवरात्रि के रूप में मनाई जाती है। शिव के प्रति समर्पण भाव करने हेतु एवं मन की शुद्धि एवं पापों के विनाश हेतु महाशिवरात्रि व्रत रखा जाता है।
फाल्गुन कृष्ण पक्ष की अमावस्या फाल्गुनी अमावस्या कहलाती है। यह अमावस्या पितरों को मोक्ष देने वाली होती है, इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है।
फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी आमलकी एकादशी कहलाती है। शत्रुओं पर विजय एवं दुखों से मुक्ति के लिए आमलकी एकादशी का व्रत रखा जाता है।
फाल्गुन मास में होली से 8 दिन पहले होलाष्टक प्रारंभ हो जाता है, होलाष्टक में कोई भी शुभ कार्य नहीं करते। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी से होलिका दहन तक 8 दिन होलाष्टक तक माने जाते हैं।
फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को होलिकोत्सव मनाया जाता है। बुराई पर भलाई की जीत के लिए होलिका पूजन एवं रंगों का त्यौहार होली मनाया जाता है। इस दिन देवताओं को अबीर और गुलाल अर्पित करना शुभ होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने पूतना नामक राक्षसी का वध भी फाल्गुन पूर्णिमा के दिन किया था।
फाल्गुन महातम्य जानिए,
फाल्गुन मास में जो दान, जप, ब्राहमण पूजन और भगवान विष्णु का पूजन करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर इस लोक तथा परलोक में विविध प्रकार के सुखों को भोगता है तथा समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
फाल्गुन मास में शीतल व सामान्य जल से स्नान करना चाहिए तथा स्वास्थ्य लाभ के लिए भोजन में अधिक से अधिक फल का प्रयोग करना चाहिए। फाल्गुन पूर्णिमा के दिन अट्ठाहस, खिलखिलाहटों और मंत्रोच्चारण से मन में एकत्र सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा को भक्ति की शक्ति के माध्यम से दूर किया जाता है। हरि ओम,
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लगभग 18 वर्षों से पत्रकारिता क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। दैनिक हिन्द गजट के संपादक हैं, एवं समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के लिए लेखन का कार्य करते हैं . . .
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