जानिए यशोदा जयंति पर किन किन वस्तुओं का करना चाहिए दान . . .

यशोदा जयंति पर जानिए माता यशोदा से जुड़ी अनेक अनसुनी बातों को विस्तार से . . .
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माता यशोदा ने भले ही भगवान श्री कृष्ण को जन्म न दिया हो पर भगवान श्री कृष्ण के साथ माता देवकी से ज्यादा नाम माता यशोदा का लिया जाता है। इस साल मंगलवार 18 फरवरी को देश भर में यशोदा जयंति का उत्सव मनाया जाएगा। इसके लिए मथुरा-वृंदावन और द्वारका समेत देशभर के मंदिर पूरी तरह सज चुके है। आज हम आपको भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी अहम गाथा आपको बताने जा रहे हैं। इस बात को तो सभी जानते हैं कि भगवान कृष्ण की मृत्यु पैर में बहेलिया का तीर लगने से हुई थी लेकिन उनके बाद उनके माता-पिता यशोदा व नंदबाबा और देवकी उपं वासुदेव का क्या हुआ था। क्या वे अनंतकाल तक जीवित रहे थे या उनका भी देहांत हुआ था। अगर देहांत हुआ था तो कैसे। आज हम इस रहस्य से आप सबके सामने पर्दा हटाने जा रहे हैं।
अगर आप जगत को रोशन करने वाले भगवान भास्कर, भगवान विष्णु जी एवं भगवान श्री कृष्ण जी की अराधना करते हैं और अगर आप विष्णु जी एवं भगवान कृष्ण जी के भक्त हैं तो कमेंट बाक्स में जय सूर्य देवा, जय विष्णु देवा, जय श्री कृष्ण, हरिओम तत सत, ओम नमो भगवते वासुदेवाय नमः लिखना न भूलिए।
जानिए कब मां यशोदा को देख बिलख उठे थे कान्हा!
जानकार विद्वानों ने बताया कि शास्त्रों के मुताबिक कुरुक्षेत्र का युद्ध शुरू होने से पहले भगवान श्रीकृष्ण द्वारका ने निकलकर मथुरा के गोकुल पहुंचे और यशोदा मैया से मिले। उस वक्त यशोदा मैया बहुत ज्यादा बीमार थी। जैसे ही कान्हा उनके घर पहुंचे, नंद बाबा और देवकी उनसे मिलकर बहुत खुश हो गए। वहीं भगवान श्रीकृष्ण उनसे मिलकर भावुक हो गए। श्रीकृष्ण के वहां से जाने के कुछ दिनों बाद बीमारी से यशोदा मैया ने देह का त्याग कर दिया।
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जानिए खुद के लिए रचा था कैसा विधान,
महाभारत का युद्ध खत्म होने के बाद भगवान श्री कृष्ण फिर से गोकुल आए और अपनी प्रिय यशोदा मैया के देह परिवर्तन पर बहुत दुख जताया। इसके बाद वे नंद बाबा को ढाढस बंधाकर द्वारका लौट गए। वहां पर एक दिन वे नदी किनारे बैठे थे। तभी एक बहेलिया का तीर उनके पैर के तलवे में आकर लगा, जिसके बाद उन्होंने भी उस शरीर को त्याग दिया, दरअसल में धरती से विदाई लेने के लिए भगवान विष्णु ने ऐसा ही विधान रचा था।
जानिए माता देवकी और पिता वासुदेव का क्या हुआ था,
जब कान्हा के देह त्यागने का समाचार मथुरा पहुंचा तो उनके पिता वासुदेव को जबरदस्त दुख पहुंचा और वे सदमे में चले गए। इसी सदमे की वजह से उन्होंने भी अपना शरीर त्याग दिया और अपने पति एवं पुत्र के देह छोड़ने का समाचार माता देवकी सहन नहीं कर पाईं। वियोग में आकर उन्होंने सती होने का फैसला किया और आग में कूदकर अपनी इहलीला समाप्त कर ली।
अब जानिए क्या हुआ था नंद बाबा का,
नंद बाबा के बारे में ज्यादा जानकारी शास्त्रों में उपलब्ध नहीं है। हालांकि मान्यता है कि नंद बाबा भगवान शिव के अनन्य भक्त थे और उनकी उपासना में लीन रहते थे। इसीलिए भगवान शिव के गण उन्हें लेने के लिए खुद धरती पर आए और सशरीर उन्हें अपने साथ स्वर्ग ले गए। जिससे उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई।
अब जानिए, यशोदा जयंति पर क्या क्या करें दान . . .,
यशोदा जयंती के दिन करें गाय का दान, गाय का दान बहुत ही शुभ और पुण्यकारी माना जाता है। गाय को माता का दर्जा दिया गया है, और इस दिन गाय को हरा चारा, गुड़, घी या बर्तन दान करना बहुत ही लाभकारी होता है।
यशोदा जयंती के दिन करें वस्त्र का दान, इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को वस्त्र दान करना चाहिए। यह दान न केवल उनके जीवन में खुशहाली लाता है, बल्कि इससे पुण्य भी प्राप्त होता है। इस दिन बच्चे के कपड़ों का दान भी करना चाहिए।
यशोदा जयंती के दिन करें अन्न का दान, यशोदा जयंती पर विशेष रूप से दीन-हीन लोगों को खाना दान करना बहुत फलदायी होता है। आप उन्हें ताजे फल, मिठाई, अनाज या अन्य खाद्य सामग्री दान कर सकते हैं।
यशोदा जयंती के दिन करें धन का दान, यशोदा जयंती पर गरीबों या मंदिरों में दान का रूप में पैसों का भी दान करना शुभ माना जाता है। इसे समाज के भले के लिए किया जाता है। धन का दान करने से घर में धन-धान्य बना रहता है।
यशोदा जयंती के दिन करें चंदन का दान, यशोदा जयंती के दिन भगवान श्री कृष्ण और माता यशोदा की पूजा करने के लिए चंदन, तेल और फूल दान करना चाहिए। यह दान पूजा में उपयोगी होता है और समृद्धि लाता है।
यशोदा जयंती के दिन करें बर्तन का दान, यशोदा जयंती के दिन घर या मंदिरों में दान देने के लिए बर्तन जैसे गिलास, थाली, या अन्य उपयोगी सामान देना भी शुभ होता है। यह दान विशेष रूप से धार्मिक कार्यों के लिए सहायक होता है।
अब जानिए माता यशोदा के बारे में रोचक कथाओं के बारे में . . .,
माता यशोदा, भगवान कृष्ण की पालक मां के रूप में जानी जाती हैं, उनके जीवन से जुड़ी कई रोचक कहानियां हैं। भगवान कृष्ण की माखन लीला, कालिया उद्धार, पूतना वध, गोचारण, गोवर्धन धारण और कृष्ण की रासलीला आदि अनेक लीलाओं से यशोदा मैया को अपार सुख मिला।
इनमें से कुछ अनसुनी बातें जानिए,
माता यशोदा का असली नाम जानिए, भागवत पुराण के अनुसार, माता यशोदा का असली नाम सुभद्रा था। उन्हें यशोदा नाम नंदराय जी के साथ विवाह के बाद मिला, जिसका अर्थ है यश (कीर्ति) और दा (देने वाली)।
जानिए कौन थीं, माता यशोदा की सगी बेटी, माता यशोदा की एक बेटी भी थीं, जिनका नाम एकांगा था, जो योगमाया भी थीं। यशोदा की बेटी ने 8 भुजाओं वाली देवी का रूप धारण कर लिया, आगे जाकर माता विंध्यवासिनी देवी के रूप में विख्यात हुई। यह बात कम लोग जानते हैं, क्योंकि एकांगा का वर्णन अधिक नहीं मिलता।
एक अन्य कथा के अनुसार वसुदेवजी बालकृष्ण को लेकर कारागार से निकलकर यमुना पार कर गोकुल पहुंचे और उन्होंने उसी रात को बालकृष्ण को यशोदा मैया के पास सुला दिया और वे उनकी पुत्री को उठाकर ले आए। गर्गपुराण के अनुसार भगवान कृष्ण की मां देवकी के सातवें गर्भ को योगमाया ने ही बदलकर कर रोहिणी के गर्भ में पहुंचाया था, जिससे बलराम का जन्म हुआ। बाद में योगमाया ने यशोदा के गर्भ से जन्म लिया था। भगवान विष्णु की आज्ञा से माता योगमाया ने ही यशोदा मैया के यहां पुत्री रूप में जन्म लिया था। इसका बाद में नाम एकानंशा रखा गया था। इनके जन्म के समय यशोदा गहरी निद्रा में थीं और उन्होंने इस बालिका को देखा नहीं था। जब आंख खुली तो उन्होंने अपने पास पुत्र को पाया जो कि कृष्ण थे। यही योगमाया आगे चलकर विंध्यवासिनी देवी के रूप में विख्यात हुई। श्रीमद्भागवत में उन्हें ही नंदजा देवी कहा गया है इसीलिए उनका अन्य नाम कृष्णानुजा है।
रोहिणी और बलराम का संबंध जानिए, भगवान श्री कृष्ण इन्हीं नंद-यशोदा के पुत्र बने और बलराम, जो कृष्ण के बड़े भाई थे, वास्तव में रोहिणी के पुत्र थे। लेकिन उनका पालन-पोषण भी माता यशोदा ने ही किया था। अतः यशोदा ने बलराम के पालन-पोषण की भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जो, रोहिणी के पुत्र और सुभद्रा के भाई थे।
विवाह की रोचक कहानी इस प्रकार है, माता यशोदा का विवाह गोकुल के प्रसिद्ध व्यक्ति नंदराय जी के साथ बड़ी धूमधाम से हुआ था। कहा जाता है कि इस विवाह में स्वयं ब्रम्हा जी और अन्य देवता भी शामिल हुए थे।
कंस के वध की भविष्यवाणी पर क्या हुआ था यशोदा माता को जानिए, जब कृष्ण का जन्म हुआ, तो आकाशवाणी हुई थी कि कंस का वध उन्हीं के हाथों होगा। यह भविष्यवाणी सुनकर माता यशोदा बहुत डर गई थीं, लेकिन उन्हें कृष्ण पर अटूट विश्वास था।
माता यशोदा के माता पिता के बारे में जानिए, ब्रजमंडल में सुमुख नामक गोप की पत्नी पाटला के गर्भ से यशोदा का जन्म हुआ। उनका विवाह गोकुल के प्रसिद्ध व्यक्ति नंद से हुआ। कहते हैं कि यशोदा वैष्य समाज से थीं।
श्रीबलराम को भी पाला था मां यशोदा ने, यशोदा ने बलराम के पालन-पोषण की भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो रोहिणी के पुत्र और सुभद्रा के भाई थे। दूसरे के पुत्र को अपने कलेजे के टुकड़े जैसा प्यार और दुलार देकर यशोदा ने एक आदर्श चरित्र का उदाहरण प्रस्तुत किया। यशोदा का जीवन सिर्फ इतना ही नहीं है। धार्मिक ग्रंथों में उनके जीवन से जुड़ी कई घटनाएं और उनके पूर्व जन्म की कथाएं भी मिलती हैं। उनकी एक पुत्री का भी वर्णन मिलता है जिसका नाम एकांगा या एकानंशा था।
श्रीराधा का विवाह हुआ था यशोदा मैया के भाई से, प्रचलित मान्यता अनुसार एक दिन श्रीकृष्ण ने माता यशोदा से कहा कि माता मैं राधा से विवाह करना चहता हूं। यह सुनकर यशोदा मैया ने कहा कि राधा तुम्हारे लिए ठीक लड़की नहीं है। पहला तो यह कि वह तुमसे पांच साल बड़ी है और दूसरा यह कि उसकी मंगनी (यशोदा के भाई रायाण) पहले से ही किसी ओर से हो चुकी है और वह कंस की सेना में है जो अभी युद्ध लड़ने गया है। जब आएगा तो राधा का उससे विवाह हो जाएगा। इसलिए उससे तुम्हारा विवाह नहीं हो सकता। हम तुम्हारे लिए दूसरी दुल्हन ढूंढेंगे। लेकिन कृष्ण जिद करने लगे थे।
श्रीकृष्ण जब छोड़ गए यशोदा मैया को, इतिहास में देवकी और रोहिणी की कम लेकिन यशोदा की चर्चा ज्यादा होती है, क्योंकि उन्होंने ही कृष्ण को बेटा समझकर पाल-पोसकर बड़ा किया और एक आदर्श मां बनकर इतिहास में अजर-अमर हो गई। महाभारत और भागवत पुराण में बालक कृष्ण की लीलाओं के अनेक वर्णन मिलते हैं जिनमें यशोदा को ब्रम्हांड के दर्शन, माखन चोरी और उनको यशोदा द्वारा ओखल से बांध देने की घटनाओं का प्रमुखता से वर्णन किया जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने माखन लीला, ऊखल बंधन, कालिया उद्धार, पूतना वध, गोचारण, धेनुक वध, दावाग्नि पान, गोवर्धन धारण, रासलीला आदि अनेक लीलाओं से यशोदा मैया को अपार सुख दिया। इस प्रकार 11 वर्ष 6 महीने तक माता यशोदा के महल में कृष्ण की लीलाएं चलती रहीं। इसके बाद कृष्ण को मथुरा ले जाने के लिए अक्रूरजी आ गए। यह घटना यशोदा के लिए बहुत ही दुखद रही। यशोदा विक्षिप्त-सी हो गईं क्योंकि उनका पुत्र उन्हें छोड़कर जा रहा था। हरि ओम,
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अखिलेश दुबे

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