ट्रंप की भारत के प्रति बौखलाहट क्यों?

 

 

(बलबीर पुंज)

पिछले कुछ वर्षों में भारत बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित हुआ है। बकौल विश्व बैंक- भारत, फ्रांस को पछाड़कर विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष की एक रिपोर्ट के अनुसार, यदि भारत आर्थिक और कारोबारी सुधारों की प्रक्रिया को वर्तमान की तरह निरंतर जारी रखता है, तो वर्ष 2030 तक भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। इस पृष्ठभूमि में भारत जैसी उभरती आर्थिक महाशक्ति को किस प्रकार की नई चुनौती और समस्या का सामना करना पड़ सकता है- वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ट ट्रंप के एक हालिया निर्णय से स्पष्ट हो जाता है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने सोमवार (4 मार्च) को अमेरिकी कांग्रेस के सांसदों को पत्र लिखकर जानकारी दी कि वह अमेरिकी व्यापारिक वरीयता कार्यक्रम (जीएसपी) के अंतर्गत एक लाभार्थी के रूप में भारत को इस सूची से 60 दिनों के भीतर बाहर कर देंगे। ट्रंप के अनुसार, यह कदम उठाना आवश्यक था, क्योंकि भारत ने अमेरिका को यह आश्वासन नहीं दिया है कि वह भारतीय बाजारों में उसे न्यायसंगत और उचित पहुंच प्रदान करेगा।

आखिर जीएसपी क्या है? यह अमेरिका का सबसे बड़ा और व्यापारिक वरीयता कार्यक्रम है, जिसकी शुरुआत वर्ष 1976 में की गई थी। इसका उद्देश्य विभिन्न देशों से आने वाले हजारों उत्पादों को शुल्क मुक्त प्रवेश की अनुमति देकर आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है। जीएसपी के अंतर्गत, 5.6 अरब डॉलर- अर्थात् लगभग 40,000 करोड़ रुपये के भारतीय निर्यात पर अमेरिका द्वारा कोई शुल्क नहीं लगाया जाता है।

ट्रंप ने पिछले सप्ताह एक कार्यक्रम में अपने चिरपरिचित धमकी भरे स्वर में कहा था, भारत एक उच्च शुल्क वाला देश है और अब उन्हें पारस्परिक कर चाहिए या फिर कम से कम कोई अन्य कर। जब हम भारत को मोटरसाइकिल भेजते हैं, तो उसपर 100 प्रतिशत शुल्क होता है। जब भारत हमारे पास मोटरसाइकिल भेजता है, तो हम उनसे कोई शुल्क नहीं लेते। मैं कहता हूं, साथियों, सुनो, वो हमसे 100 प्रतिशत वसूल रहे हैं। ठीक उसी उत्पाद के लिए, मैं उनसे 25 प्रतिशत वसूलना चाहता हूं। मुझे लगता है कि 25 प्रतिशत भी मूर्खता वाला होगा, ये 100 प्रतिशत होना चाहिए। लेकिन मैं आपके लिए इसे 25 प्रतिशत करने जा रहा हूं। मुझे आपका समर्थन चाहिए।

ट्रंप की चेतावनी के बाद भारत ने अपने कृषि, दुग्ध और मुर्गी पालन बाजार को अमेरिका के लिए खोलने की सहमति जताते हुए ट्रंप सरकार को इसका एक औपचारिक प्रस्ताव भेजा था। प्रतिकूल इसके राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत को अमेरिकी व्यापारिक वरीयता कार्यक्रम से बाहर करने की घोषणा कर दी।

फिलहाल, जीएसपी के अंतर्गत रसायन और अभियांत्रिकी जैसे क्षेत्रों के लगभग पांच हजार भारतीय उत्पाद शुल्क मुक्त श्रेणी में है। अमेरिका द्वारा जीएसपी लाभ बंद किए जाने भारतीय वाणिज्य सचिव अनूप वधावन का कहना है कि इससे भारत को कोई खास नुकसान नहीं होगा, क्योंकि इस अमेरिकी कार्यक्रम से मिलने वाला लाभ बहुत अधिक नहीं है और पूरे मामले को बातचीत के माध्यम से सुलझा लिया जाएगा। भारत मुख्य तौर पर कच्चामाल, जैविक रसायन, हस्तशिल्प, रत्न, आभूषण जैसे उत्पाद अमेरिका को निर्यात करता है।

भारत ने 2017-18 में अमेरिका को 48.6 अरब डॉलर- अर्थात 3,39,811 करोड़ रुपये के उत्पादों का निर्यात किया था, जिसमें केवल 5.6 अरब डॉलर शुल्क मुक्त था- अर्थात् उससे भारत को प्रतिवर्ष 19 करोड़ डॉलर- अर्थात 1,345 करोड़ रुपये का शुल्क लाभ हुआ था। स्पष्ट है कि भारत को हालिया निर्णय से बहुत अधिक नुकसान नहीं होगा। भारत, अमेरिका के साथ व्यापार अधिशेष (ट्रेड सरप्लस) वाला ग्यारहवां सबसे बड़ा देश है- अर्थात, भारत का अमेरिका को निर्यात, वहां से आयात से अधिक है। 2017-18 में भारत का अमेरिका के प्रति वर्ष व्यापार अधिशेष 21 अरब डॉलर- लगभग 1,48,667 करोड़ रुपये था। जब से ट्रंप अमेरिकी राष्ट्रपति बने है, तब से वह अपनी संरक्षणवादी नीतियों के अनुरूप अमेरिका का व्यापारिक घाटा कम करने हेतु काफी आक्रामक हैं। इसके लिए उन्होंने तो एशियाई आर्थिक शक्ति चीन के विरुद्ध व्यापारिक युद्ध भी छेड़ दिया।

संरक्षणवादी ट्रंप का हालिया कदम स्पष्ट करता है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भारतीय बाजार को जिस वांछित सीमा तक अमेरिका के लिए खुलवाना चाहते थे, उसमें आपेक्षित सफलता नहीं मिलने पर वह बौखला गए है। प्रथम दृष्टया प्रतीत होता है कि अमेरिका ने विशुद्ध रूप से अपने व्यापारिक घाटे को कम करने के लिए इस प्रकार का भारत विरोधी निर्णय लिया है। क्या वाकई ऐसा है?

वास्तव में, ट्रंप के भारत के प्रति बौखलाहट का कारण कुछ और ही है। बीते 58 महीनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में मेक इन इंडिया के अतिरिक्त आयुष्मान भारत जैसी दर्जनों जनहितैषी और जनकल्याण योजनाएं चलाई है, जिसका उद्देश्य पंक्ति में बैठे आखिरी व्यक्ति को आर्थिक और सामाजिक लाभ पहुंचाना है। इसी कड़ी में मोदी सरकार द्वारा वर्ष 2017-18 में स्टेंट और घुटना प्रतिरोपण के मूल्यों को भी नियंत्रित किया गया है।

भारतीय बाजार में दो प्रकार के स्टेंट बिकते हैं। ड्रग इल्युटिंग स्टेंट- जिसका मूल्य पहले 1,29,404 रुपये तक था, जो सरकारी नियंत्रण के बाद लोगों को अधिकतम 29,600 रूपये में मिल रहा है। देश में 90 प्रतिशत ह्द्य-रोगियों को यही स्टेंट लगाया जाता है। जबकि अन्य स्टेंट बेरे मैटल स्टेंट है, जिसकी बाजार में कीमत 45,095 रुपये थी, जो अब 7,260 रुपये में उपलब्ध है। इसी तरह, कोबाल्ट क्रोमियम घुटना प्रत्यारोपण, जिसकी पहले कीमत ढाई लाख रुपये थी- वह अब 60 हजार से कम में संभव है। वही मेटल जिनकोनिम घुटना प्रत्यारोपण, जिसे करवाने में पहले कम से कम 4.5 लाख तक का खर्चा आता था- वह 77 हजार रुपये में करवाया जा सकता है। इसी प्रकार अन्य घुटना प्रत्यारोपण की कीमतों को भी सरकार द्वारा नियंत्रित किया गया है।

सरकारी आंकड़े के अनुसार, देश में डेढ़ से दो करोड़ रोगियों को घुटना बदलवाने की जरुरत है और प्रतिवर्ष भारत में 1.2-1.5 लाख ऐसी सर्जरी होती हैं। वही भारत में 3.2 करोड़ लोग हृदय-रोगी हैं और हर वर्ष इससे 16 लाख लोगों की मौत होती है। किंतु मोदी सरकार द्वारा घुटना प्रत्यारोपण और स्टेंट की कीमतों को नियंत्रित करने के कारण विदेश से भी कई लोग उपचार हेतु भारत आ रहे हैं।

अब अमेरिका की स्थिति क्या है? अमेरिका में जहां घुटना प्रत्यारोपण करवाने में 35-50 हजार अमेरिकी डॉलर- अर्थात् 24-35 लाख का खर्चा आता है, वही भारत में यह सरकारी नियंत्रण के बाद 55 हजार से डेढ़ लाख रुपये में संभव है। इसी तरह, बेरे मैटल स्टेंट और ड्रग इल्युटिंग स्टेंट की कीमत अमेरिका में क्रमशः 670 और 2070 अमेरिकी डॉलर- अर्थात् 47 हजार और 1.45 लाख रुपये है, जबकि भारत में यह क्रमशः लगभग 7,200 और 29,600 रुपये में उपलब्ध है।

निर्विवाद रूप से वैश्विकरण के दौर में 133 करोड़ की आबादी वाला भारत एक बहुत बड़ा बाजार है और बीते कुछ वर्षों से एक औसत भारतीय की खर्च करने की सीमा भी बढ़ गई है। इस पृष्ठभूमि में अमेरिका चाहता है कि मोदी सरकार ने जिस प्रकार घुटना प्रत्यारोपण और स्टेंट की कीमतों को जरूरी दवा के रूप में नियंत्रित किया है, वह उसे निरस्त करें। यदि ऐसा होता है, तो अमेरिका सहित पश्चिमी देशों की कंपनियों की चांदी हो जाएगी। अमेरिकी सांसद वर्ष 2017 से इसपर अपनी आपत्ति जता रहे है, किंतु हर बार भारत अपनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए इसमें परिवर्तन करने से साफ इनकार कर देता है।

भारत में अमेरिकी ई-कॉमर्स कंपनियों से सख्ती को लेकर भी ट्रंप सरकार और अन्य अमेरिकी सांसद चिंतित है। जहां प्रधानमंत्री मोदी ने देश की संप्रभुता की सुरक्षा हेतु इन कंपनियों पर नियम-कानूनों को कड़ा किया है, वही अमेरिका को लगता है कि ऐसी नीतियां उसकी कंपनियों को दबाने के लिए किया जा रहा है। मोदी सरकार की हालिया नीति के अनुसार, अमेरिकी ई-कॉमर्स कंपनियां अब अपनी हिस्सेदार कंपनियों के उत्पाद भारत में नहीं बेच पाएंगी। अब यही नीतियां अमेरिका के अनुकूल तो बिल्कुल भी नहीं है, किंतु इससे भारतीय व्यापारियों और कंपनियों के हितों की रक्षा की जा रही है।

इन घटनाक्रमों से दो बातें स्पष्ट है। पहली- विश्व भारतीय शक्ति, प्रतिभा और भारत निर्मित उत्पादों की अनदेखी नहीं कर पा रहा है। साथ ही विकसित देशों की भांति भारत की सामरिक, आर्थिक और सामाजिक नीतियों का व्यापक प्रभाव भी शेष विश्व पर पड़ने लगा है। दूसरा- भारी अंतरराष्ट्रीय दवाब के बीच वर्तमान भारतीय नेतृत्व देशहित और जनकल्याणकारी निर्णय लेने में सक्षम और अटल है।

(साई फीचर्स)

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