संसार और अपने समय को देखती मर्मभेदी दृष्टि

 

 

(विजय कुमार)

उनकी कुछ पुस्तकें पढ़ी हैं और कई बार शहर में आयोजित कुछ महत्वपूर्ण संगोष्ठियों में उन्हें सुनने के अवसर मिले हैं। उद्दाम सृजनात्मक ऊर्जा, वैचारिक प्रखरता से लबरेज बेबाकी, एक विरल सादगी और जीवन की गहन अंतर्दृष्टि से स्पंदित वह एक तेजस्वी महिला हैं। शांता गोखले- यह नाम इस शहर के समकालीन सांस्कृतिक परिदृश्य की जैसे कि एक धुरी बनकर उभरता है। पिछले पांच दशकों के हमारे इस जटिल, अनेक पर्तों वाले, निरंतर बदलते हुए और चुनौतियों भरे सांस्कृतिक और सृजनात्मक समय की वह एक सजग और सक्रिय गवाह रही हैं- एक एंगेज्ड ऑब्जर्वर के रूप में जो कि उनकी इधर आई एक महत्वपूर्ण पुस्तक का शीर्षक भी है।

शांता गोखले की ओर देखना यानी आधुनिक जीवन के सामूहिक अवचेतन में समाये साहित्य, कला, समाज, संस्कृति और राजनीति के अंतर्सबंधों को समझना है। शांता ताई ने मातृभाषा मराठी औरे अंग्रेजी दोनों में विपुल लेखन किया है। सहज विश्वास नहीं होता कि किसी एक व्यक्तित्व के भीतर कैसे एक साथ इतनी भूमिकाएं समाहित हो सकती हैं। उन्होंने उपन्यास लिखे, नाटक लिखे, दुर्गाखोटे की आत्मकथा का अंग्रेजी अनुवाद किया, 1843 से आज तक के मराठी नाटक का सांस्कृतिक इतिहास लिखा, बंबई में प्रयोगशील नाटक के मौखिक इतिहास को दर्ज़ किया, डॉक्युमेंट्री फिल्में बनाईं, कई वृत चित्रों और फीचर फिल्मों की पटकथाएं लिखीं, अभिनय किया।

एल्फिंस्टन कॉलेज में अंग्रेजी साहित्य पढाया, सी.टी. खानोलकर, विजय तेंदुलकर, महेश एलकुंचवार, सतीश आलेकर जैसे लेखकों के नाटकों के अंग्रेजी अनुवाद किए, वीणापाणि चावला और सत्यदेव दुबे के रंगकर्म पर अद्भुत पुस्तकें लिखीं, संगीतकारों पर टिप्पणियां लिखीं, वह टाइम्स ऑफ इंडिया में आर्ट डायरेक्टर और फेमिना पत्रिका के संपादकीय विभाग में रहीं। इवनिंग न्यूज ऑफ इंडिया, इंडिपेंडेंट, मिड डे और मुंबई मिरर जैसे अखबारों में बरसों तक उन्होंने अपने बहुचर्चित साप्ताहिक कॉलम लिखे। जनजीवन से उनका कैसा गहरा जुड़ाव रहा है, इसका एक उदाहरण है कि एक समय जब वह ग्लेक्सो कंपनी में जनसंपर्क अधिकारी थीं, उस दौरान उन्होंने वहां के कामगारों को लंच टाइम में नुक्कड़ नाटक करने के लिए प्रेरित किया, उन्हें प्रशिक्षण दिया। वह मराठी और अखिल भारतीय अंग्रेजी साहित्य के बीच पिछले पांच दशकों से लगभग एक सेतु की तरह रही हैं। दो भाषाओं के बीच इस आवा-जाही ने उनके दृष्टिकोण को समृद्ध और असाधारण रूप से बहुआयामी बनाया है।

अभी कुछ महीनों पहले ऊटी में आयोजित एक लिटरेरी फेस्टिवल में शांता गोखले को जब लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया, तो उस अवसर पर उन्होंने अपने व्याख्यान में मौजूदा राजनीतिक संस्कृति और भारतीय जनतंत्रिक व्यवस्था के सूरत-ए-हाल पर जो कहा, उसमें हमारे वर्तमान समय के संकट को लेकर कुछ बड़ी चिंताएं हैं। उन्होंने कहा कि साठ साल पहले जब मैंने लिखना शुरु किया था, तो कभी सोचा नहीं था कि एक नव स्वतंत्र देश में आशा का जनतंत्र अपने छह दशकों की यात्रा में बौद्धिकों और कलाकारों के लिए भय के जनतंत्र में बदल जाएगा। यूं तो साठ के दशक में ही एक गहरे मोहभंग की स्थितियां जन्म ले चुकी थीं। सामाजिक विषमताओं, अभाव और अन्याय की स्थितियों को लेकर लेखकों-कलाकारों के भीतर एक गुस्सा और गहरा असंतोष था। लेखन-कर्म से पुराना आत्मतुष्ट मध्यवर्गीय रोमान विदा ले रहा था और हमारे नए किस्म के तनावों की अभिव्यक्ति के लिए तब एक स्पेस था।

सत्ता की ताकत के नशे और उसके अंतर्विरोधों पर विजय तेंदुलकर घासीराम कोतवाल जैसा तीखा नाटक लिख सकते थे। मनुवादी व्यवस्था के खिलाफ नामदेव ढसाल गोलपीठा की कविताएं लेकर आये थे। जी. पी. देशपांडे उध्वस्त धर्मशाला जैसा एक बेहद आक्रामक राजनीतिक नाटक लिख सके थे। गोविंद निहलानी जैसा फिल्मकार पुलिस, राजनेता और पेशेवर अपराधी के गठबंधन पर अर्ध सत्य जैसी फिल्म बना सकता था।

शांता गोखले का यह कथन बेहद महत्वपूर्ण है कि इमरजेंसी के दिनों में जब अभिव्यक्ति की आजादी पर सेंसरशिप लगी, तब उनकी पीढ़ी को पहली बार यह अनुभव हुआ था कि जनतंत्र के इस सेब में कीड़े लग चुके हैं। वह आत्मतुष्ट मध्यवर्गीय निद्रा से झिंझोड़ कर जगा देने वाला अनुभव था। लेकिन आज की स्थितियां तो और भी भयानक हो चुकी हैं। आज सारे विमर्शों और बहसों को खत्म किया जा रहा है। संस्कृति, नैतिकता और राष्ट्रवाद की एकल परिभाषाएं गढ़ी जा रही हैं। आज के सम्राट जानते हैं कि वे असुरक्षित हैं। राजा नंगा है कहने वालों को सलाखों के पीछे धकेल दिया जा रहा है। जो बौद्धिक और लेखक-कलाकार आदिवासियों और दलितों के हक के लिये आवाज उठाते हैं, उन्हें अर्बन नक्सल कहकर प्रताड़ित किया जा रहा है। राजनीतिक और धार्मिक ताकतों ने भीड़-तंत्र को कानून अपने हाथ में लेने की खुली छूट दे रखी है।

अपनी हाल ही में प्रकाशित पुस्तक एंगेज्ड ऑब्जर्वर के लेखों और टिप्पणियों में शांता गोखले ने विंदा करंदीकर, सत्यदेव दुबे, विजय तेंदुलकर या हबीब तनवीर के सृजनात्मक व्यक्तित्व को विश्लेषित किया है। कवि अरुण कोलटकर को विदाई दी है। संगीतज्ञ अशोक रानाडे, भास्कर चंदावरकर, अलादिया खां, पं. जाल बालपोरिया पर अपने स्मृति-लेख लिखे हैं। अपने उस पैतृक आवास ललित स्टेट नं. 5, शिवाजी पार्क, दादर को याद करते हुए एक बीते हुए समय, अपने समृद्ध बचपन, कलाकारों, संगीतकारों और आला दर्जे के बौद्धिकों के सान्निध्य, बहसों और विमर्श की उस खुली दुनिया, मनुष्य संबंधों के परस्पर रागात्मक संसार और अपने घर की उन दीवारों और बरामदों को देख रही हैं, जो चेतना के एक सघन संसार का अभिन्न हिस्सा बन गए हैं।

कितना मार्मिक है एक असाधारण प्रतिभा का पिछले पांच दशक का वह निजी संघर्ष, जब एक विफल वैवाहिक जीवन के बाद वह अकेले के दम पर अपने जीवन का पुनर्संयोजन करती है, दो छोटे बच्चों की परवरिश और कदम-कदम पर आर्थिक चुनौतियां और असुरक्षा। संभवतः उसी ने उसके भीतर इस साहसी, जागरूक और अति संवेदनशील फौलादी व्यक्तित्व को रचा होगा।

शांता गोखले की बेटी प्रसिद्ध अभिनेत्री रेणुका शहाणे ने अपनी मां के उपन्यास रीता वेलिनकर पर 2009 में रीता नाम से एक मराठी फिल्म बनाई, जिसमें नायिका का व्यक्तित्व कोमलता और दृढता, अधीनता और स्वावलंबन, ईमानदारी और समझौतों के तमाम धूप-छांही रंगों को रचता है। इस तरह शांता गोखले दर्शाती हैं कि सृजनात्मक जीवन की गरिमा क्या होती है।

(साई फीचर्स)

One thought on “संसार और अपने समय को देखती मर्मभेदी दृष्टि

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *