का वर्षा जब कृषि सुखानी!

 

 

(शरद खरे)

एक पुरानी कहावत है का वर्षा जब कृषि सुखानी अर्थात पानी के अभाव में जब फसल सूख जाये तब अगर बारिश होने भी लगे तो वह किसान के किस काम की! इसी तर्ज पर जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के द्वारा शालाओं में कॉपी-किताब और गणवेश के लिये पालकों को दुकान विशेष से सामग्री खरीदने के लिये बाध्य न किये जाने के आदेश 30 मार्च को जारी किये गये हैं। यहाँ यह उल्लेखनीय होगा कि इस साल शैक्षणिक सत्र का आगाज़ 01 अप्रैल से हो चुका है।

जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में पदस्थ अधिकारी और कर्मचारी भी कभी विद्यार्थी रहे होंगे। इस लिहाज से इस बात से वे भली भाँति परिचित होंगे कि शैक्षणिक सत्र के आरंभ होने के कम से कम एक सप्ताह पहले से ही विद्यार्थियों के गणवेश, कॉपी-किताब आदि की तैयारियां आरंभ हो जाती हैं।

इस साल शैक्षणिक सत्र का आगाज़ 01 अप्रैल से किये जाने के संबंध में जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के द्वारा बार-बार ताकीद किया जाता रहा, पर पालकों पर कॉपी-किताब और गणवेश के पड़ने वाले अतिरिक्त बोझ के संबंध में समय रहते सुध लेने की फुर्सत जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय को नहीं मिली। वरना क्या कारण था कि 01 अप्रैल के एक सप्ताह पहले की बजाय शैक्षणिक सत्र के आरंभ होने के महज़ दो दिन पहले जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय की बजाय जिला कलेक्टर को इस तरह के आदेश जारी करने पर बाध्य होना पड़ा।

राज्य शिक्षा केंद्र के द्वारा पाठ्यक्रम में शामिल कॉपी-किताबों, गणवेश आदि के बारे में न जाने कितने बार दिशा निर्देश जारी किये जा चुके हैं। इन निर्देशों के अनुसार कॉपी-किताब और गणवेश की कम से कम तीन दुकानें होना आवश्यक है जिनमें यह मिल सकें। संभवतः प्रतिस्पर्धा के कारण पालकों को ये सब सस्ती मिल जायें इसके लिये ऐसा किया गया होगा।

याद नहीं पड़ता कि जिले में जिला प्रशासन अथवा शिक्षा विभाग के द्वारा कभी जिला मुख्यालय सहित जिले भर में यह देखने की जहमत उठायी गयी हो कि कितनी दुकानों पर एक शाला के गणवेश के अलावा कॉपी-किताबें मिल रही हैं। इसका नतीजा है कि हर बार पालकों की जेब तराशी ही होती आयी है।

पता नहीं जनता के गाढ़े पसीने से संचित राजस्व से वेतन पाने वाले सरकारी नुमाईंदों को जनता को राहत दिलाने वाले सरकारी दिशा निर्देशों के पालन करवाने में पसीना क्यों आता है! जिला शिक्षा अधिकारी अगर चाहते तो अपने मातहतों के जरिये शैक्षणिक सत्र के आरंभ होने के पहले ही, उनके द्वारा इसकी जाँच करवा ली जाती और इस मामले में ठोस कार्यवाही की जाती।

जनता से सीधे जुड़े इस मामले में जनता का जनादेश प्राप्त नुमाईंदों, प्रमुख सियासी दल काँग्रेस और भाजपा के जिला और नगर संगठनों के साथ ही साथ छात्र संगठनों का मौन भी आश्चर्य जनक ही माना जायेगा। वर्तमान में कॉपी-किताब या गणवेश मिलने वाली दुकानों के साथ ही साथ शालाओं का निरीक्षण करने की फुर्सत भी शिक्षा विभाग के अधिकारियों को नहीं मिल पायी है, जिसके कारण लगने लगा है कि 30 मार्च को जिला कलेक्टर के द्वारा जारी किये गये आदेश महज रस्म अदायगी के लिये ही जारी किये गये थे। संवेदनशील जिला कलेक्टर प्रवीण सिंह से जनापेक्षा है कि वे ही अब स्वसंज्ञान से इस मामले में कार्यवाही सुनिश्चित करवायें।

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