जमकर है पचधार के मटकों की माँग

देशी फ्रिज का आज भी है चारों ओर चलन

(जाहिद शेख)

कुरई (साई)। इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक की समाप्ति पर लोग भले ही अत्याधुनिक तकनीकों पर भरोसा जता रहे हों पर जल को शीतल और शुद्ध रखने वाले मटकों की माँग आज भी लोगों के बीच बनी हुई है। लोगों के घरों में भले ही फ्रिज हो पर इन देशी फ्रिज (मटकों) की माँग में कमी नहीं आयी है।

आधुनिक संसाधनों के बावजूद पुरातन काल से चले आ रहे मिट्टी के मटके आज भी लोगों के लिये उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं। पानी को शुद्ध और ठण्डा बनाये रखने देशी फ्रिज के तौर पर इस्तेमाल मटकों की माँग जिले व प्रदेश में बनी हुई है। गर्मी के रौद्र रूप धारण करते ही जिले के पचधार में माटीकला से तैयार मटकों की माँग बढ़ गयी है। जिले के पचधार व कान्हीवाड़ा क्षेत्र में तैयार मटकों की माँग इतनी अधिक है कि पड़ौसी जिलों के अलावा दूसरे प्रदेशों तक इसकी सप्लाई की जा रही है।

परंपरागत देशी फ्रिज की माँग : मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित खवासा के पचधार में तैयार हाने वाले परंपरागत देशी फ्रिज (मटके) अपनी कलाकारी के लिये मशहूर हैं। सिवनी के अलावा महाराष्ट्र के नागपुर सहित कई जिलों में इन मटकों का इस्तेमाल बड़ी मात्रा में किया जा रहा है।

भीषण गर्मी के दौरान मिट्टी की सौंधी – सौंधी खुशबू के साथ ठण्डा पानी लोगों की प्यास बुझा रहा है। इसकी उपयोगिता का पता इसी बात से चलता है कि कम कीमत पर मिलने वाले मिट्टी के मटके आधुनिक फ्रिज व वाटर कूलर को भी मात दे रहे हैं। खवासा के समीप पचधार नयेगाँव में लगभग 75 फीसदी कुम्हार जाति के लोग रहते हैं जो कई पीढ़ियों से लाल व काले मटकों सहित मिट्टी के अन्य बर्तनों का निर्माण कर रहे हैं।

दोनों गाँव के ज्यादातर परिवारों को इसी से रोजी-रोटी मिलती है। इन ग्रामों में साल भर मटका निर्माण का कार्य जारी रहता है। निर्मित मटकों का 90 प्रतिशत भाग पड़ौसी प्रांत महाराष्ट्र के नागपुर जिले में भेजा जाता है। गाँव के रघुवीर पोंडे ने बताया कि वे लोग तैयार मटकों को थोक व्यापारियों को बेचते हैं जिन्हें व्यापारी ट्रकों से नागपुर ले जाते हैं। यहाँ अच्छे दाम पर मटकों को बेचा जाता है।

इस कार्य से जुड़े लोगों का कहना है कि उन्हें जो मूल्य मिलता है वह काफी कम होता है। इसमें बढ़ौत्तरी होनी चाहिये क्योंकि मेहनत व लागत के बाद परिवार केवल इतना बच पाता है की गुजर बसर हो सके। चूँकि मेहनत व मशक्कत के इस कार्य में पूरा परिवार हाथ बंटाता है इसलिये बचत बहुत थोड़ी हो पाती है।

कारीगरों का कहना है कि अगर इसी काम को मजदूरों से कराया जाये तो लागत निकालना भी मुश्किल हो जायेगा। ग्राम वासियों ने बताया कि उन्हें खुशी इस बात की है कि उनके द्वारा निर्मित मटके नागपुर वासियों की प्यास बुझाते हैं। उन्हांेने कहा कि उन्हें इस बात का संतोष है कि भीषण गर्मी में किसी प्यासे को ठण्डा पानी मिलता है जो उनके लिये पुण्य के समान है।