लकड़ी का कारोबार वैध है या अवैध!

 

 

आधा दर्जन फर्नीचर विक्रेता व निर्माता का है पंजीयन

(फैयाज खान)

छपारा (साई)। वन परिक्षेत्र छपारा के कार्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार छपारा में फर्नीचर की मात्र आधा दर्जन दुकानों का निर्माता और विक्रेता का पंजीयन है, जबकि नगर की दर्जनों दुकानें हैं जो लकड़ियों के सामान बेच रही हैं। इन दुकानों में सोफे, पलंग, टेबल कुर्सी, ड्रेसिंग टेबल को करीने से सजा हुआ आसानी से देखा जा सकता है।

वन परिक्षेत्र कार्यालय छपारा के सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि छपारा नगर में मात्र 06 दुकानों का ही अधिकृत निर्माता और विक्रेता का पंजीयन है। जानकारों की मानंे तो विक्रेताओं को नियमों के अनुसार लकड़ी की सामग्री बेचने वाले दुकानदारों का वन विभाग कार्यालय से पंजीयन होता है।

पंजीयन के बाद ही व्यापारीगण लकड़ी की बनी हुईं सामग्रियां बेच सकते हैं। देखने में यह आ रहा है कि वैवाहिक सीजन के साथ ही साथ पूरे साल इलेक्ट्रॉनिक दुकान, बर्तन दुकान व ऐसे कई प्रतिष्ठानों में लकड़ी के सामान बिकने के लिये रखे रहते हैं। सवाल यह उठता है कि जब विभाग से 06 ही दुकान निर्माता और विक्रेता पंजीकृत हैं तो कैसे बिना पंजीयन के धड़ल्ले से लकड़ी का सामान इन दुकानदारों द्वारा बेचा जा रहा है। इस मामले में फौरी तौर पर जाँच की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

ठगे जा रहे हैं पंजीकृत दुकानदार : पंजीकृत दुकानदारों का कहना है कि उन्हें कार्यालय को यह भी बताना होता है कि उनके पास यह लकड़ी किस डिपो से खरीदी गयी, कितनी मात्रा में खरीदी गयी और कितनी मात्रा में उनका समान बनाया गया है। कितनी लकड़ी उनके पास उपलब्ध है और कितनी मात्रा में बनाकर सामग्री बेची गयी है जबकि पंजीकृत दुकानदारों का समय – समय पर वन विभाग के अधिकारी निरीक्षण भी किया करते हैं।

नगर में दो दर्जन दुकानदार बिना विक्रेता और निर्माता के पंजीयन के धड़ल्ले से लकड़ी की सामग्री बेच रहे हैं। इनसे वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी कभी पूछताछ तक करते नहीं दिखते हैं कि आखिर उनके द्वारा जो लकड़ी का सामान बेचा जा रहा है उसका स्त्रोत क्या है? उक्त मामले में जाँच किये जाने की नितांत आवश्यकता है। क्षेत्र में अवैध सागौन कटाई की खबरें मिलती रहती हैं ऐसे में विभाग के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं।

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