रेफरल अस्पताल में नहीं हो पा रहा मरीजों का उपचार!

 

सालों से उपचार की बजाय मरीजों को रेफर करने में ली जा रही दिलचस्पी

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। एक समय महाकौशल अंचल में मेडिकल कॉलेज के बाद सबसे बड़े अस्पताल की दुर्दशा देखते ही बन रही है। यहाँ मरीजों का उपचार करने की बजाय उन्हें रेफर करने में ही ज्यादा दिलचस्पी ली जा रही है। ब्हाय रोगी विभाग में तैनात डॉक्टर रोजाना अस्पताल आने वाले रोगियों को परीक्षण कर दवाईयों की पर्ची तो दे रहे हैं लेकिन गंभीर मरीजों को सीधे नागपुर व जबलपुर रेफर किया जा रहा है।

एनिस्थीसिया डॉक्टर न होने से प्रभावित हो रहे ऑपरेशन : अस्पताल में प्रथम श्रेणी के 32 विशेषज्ञ चिकित्सकों की आवश्यकता है। हालांकि यहाँ पर महज आधा दर्जन चिकित्सक ही पदस्थ हैं। द्वितीय श्रेणी में 15 मेडिकल ऑफिसर, एक दंत चिकित्सक सहित 16 द्वितीय श्रेणी चिकित्सकों में से कई डाक्टर पीजी डिग्रीधारी हैं जो मरीजों का ऑपरेशन करने में सक्षम हैं।

इसके बावजूद विशेषज्ञ डाक्टरों की कमी बताकर मरीजों को महानगर भेजा जा रहा है। ज्यादातर मरीजों के रेफर होने की वजह प्रबंधन एनिस्थीसिया विशेषज्ञ की कमी को मान रहा है। वहीं क्रिटिकल केसों के मामले में अस्पताल के पास वेंटिलेटर व अन्य जरूरी उपकरण नहीं हैं। मशीनों को ऑपरेट करने वाले प्रशिक्षित स्टाफ व डाक्टरों की भी कमी अस्पताल में बनी हुई है।

स्त्री रोग चिकित्सकों का टोटा : जिला अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ डाक्टरों की कमी सबसे ज्यादा महिला मरीजों पर भारी पड़ रही है। डिलेवरी के लिये अस्पताल आने वाली ज्यादातर महिला मरीजों को डाक्टर के इशारों के मुताबिक उपचार कराना पड़ता है। विरोध करने वाले परिजनों को रेफर कर दिया जाता है।

ऑपरेशन में देरी और टालमटोल को लेकर भी अस्पताल में कई बार महिला मरीज के परिजनों व डाक्टरों के बीच विवाद की स्थिति निर्मित हो चुकी है जबकि महीनों तक मरीजों को अस्पताल में चक्कर लगवाये जाते हैं। हालत गंभीर देखते ही डॉक्टर रिस्क लिये बिना मरीजों को रेफर कर जबलपुर या नागपुर भेज देते हैं।

अस्पताल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के पद रिक्त होने से व्यवस्थाओं को संचालित करने में मुश्किलें आ रही हैं। प्रबंधन के मुताबिक अगर इन कर्मचारियों की कमी दूर हो जाये तो व्यवस्थाएं काफी हद तक पटरी पर लौट सकती हैं। अस्पताल में वार्ड ब्वॉय के 40 पद स्वीकृत हैं इनमें से 20 खाली हैं।

दस भृत्य में से सिर्फ चार कार्यरत हैं। अंशकालीन स्वीपर के पद खाली हैं। आया के सात में से 03, कुक के पाँच में से तीन, चौकीदार के तीन पदों में से दो, धोबी के सात में से 06 पद खाली बताये जाते हैं। इसी तरह लैब अटेंडेंट के चार में से 03, ओटी अटेंडेंट के दस में से 05 पद रिक्त हैं। स्वीपर के 22 पदों में से एक दर्जन पद खाली हैं।

अस्पताल प्रबंधन का दावा है कि ऑफिस स्टाफ की कमी से प्रशासनिक कार्यों को संचालित करने में मुश्किलें आ रही हैं। प्रशासनिक अधिकारी, लेखापाल, मुख्य लिपिक, एएसओ, कंप्यूटर ऑपरेटर के एक-एक स्वीकृत पद खाली हैं। सहायक ग्रेड-3 के सात में से दो पद खाली है। स्टोर कीपर के दो स्वीकृत पद रिक्त हैं। स्टुवर्ड, डाईटीशियन का पद भी खाली हैं।

वाहन चालक चार के मुकाबले महज एक पद पर कार्यरत है। छः रेडियोग्राफर के मुकाबले 04 कार्यरत हैं। फॉर्मासिस्ट ग्रेड-2 पद पर 10 कर्मचारियों के मुकाबले पाँच कार्यरत हैं। डार्करूम अस्टिटेंट छः में से दो कार्यरत हैं। 02 लैब सहायक कार्यरत हैं जबकि दो की जरूरत है। बायोकेमिस्ट का पद रिक्त है।

09 लैब टेक्नीशियन में से सात अपनी सेवाएं दे रहे हैं। ड्रेसर ग्रेड-1 में आठ में से पाँच कार्यरत हैं जबकि ग्रेड-2 के दोनों पद खाली हैं। इसी तरह नेत्र सहायक के 02, नर्सिंग अधीक्षक का एक पद खाली है। मेट्रन के 07 में से 04 पद खाली हैं। नर्सिंग सिस्टर के 14 में से 09 पद खाली हैं।

दुर्घटनाओं के प्रकरण आते हैं अधिक : जिला अस्पताल में हर दिन लगभग चार सौ से पाँच सौ रोगी उपचार करवाने के लिये पहुँचते हैं। फोरलेन पर स्थित होने के कारण जिले में हादसों में घायलों के अस्पताल पहुँचने की संख्या सबसे अधिक होती है। डॉक्टरों के अस्पताल में न रहने के कारण कई बार घायलों की जान पर बन आती है। यही स्थिति प्रसूती महिलाओं के साथ रहती है। अस्पताल में पिछले आठ सालों से नेत्र रोगियों के मोतियाबिंद के ऑपरेशन बंद हैं। बण्डोल, गोपालगंज, छुई इत्यादि स्वास्थ्य केंद्रों में तैनात डाक्टरों की अल्पकालीन सेवाएं अस्पताल में ली जा रही हैं। इसके बावजूद मरीजों को जरूरी स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं।

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