बुर्का विवाद : आतंक और चुनाव की तुलना नहीं..!

 

 

(ओमप्रकाश मेहता)

पिछले दिनों श्रीलंका में हुए आतंकी विस्फोटों और उनमें भारी नरसंहार के बाद श्रीलंका सरकार ने चेहरा ढंकने वाली हर वस्तु पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिसमें मुसलमानों का बुर्का हिन्दूओं का घुंघट भी शामिल है, यही नहीं दो पहिया वाहन के उन चालकों पर भी प्रतिबंध लगा दिया है जो अपना चेहरा कपड़े से ढंक कर वाहन चलाते है।

वैसे इतनी बड़ी आतंकी घटना के बाद ऐतिहात के बतौर श्रीलंका सरकार द्वारा उठाया गया यह कदम गलत नहीं है, किंतु अब भाजपा के ही एक सहयोगी संगठन शिवसेना ने भारत में भी इसी तरह का प्रतिबंध लगाने की मांग यह कहकर की है कि जब रावण की लंका यह कदम उठा सकती है तो राम की अयोध्या वाला यह हमारा देश यह कदम क्यों नहीं उठा सकता?

चूंकि मोदी सरकार की बदौलत भारत पिछले पांच साल से बड़ी आतंकी घटना से अछूता रहा है इसलिए यहां चुनाव में मुंह ढंक कर फर्जी वोटिंग की आशंका का सहारा लेकर यह मांग उठाई जा रही है। शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना की सम्पादकीय में इस मुद्दे को उठाते हुए उक्त मांग की गई है, यद्यपि आरोपों के घेरे में घिरने के बाद शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने यह सफाई अवश्य दी कि यह अखबार और उसके सम्पादक की धारणा है पार्टी की नहीं?

क्योंकि पार्टी फोरम पर कभी भी इस विषय में चर्चा कर ऐसा कोई फैसला नहीं लिया गया। यद्यपि भाजपा ने इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया, क्योंकि यह इस्लाम धर्म से जुड़ा मामला था और इस चुनावी माहौल में भाजपा मुस्लिम वोट का खतरा उठाना नही चाहती, वैसे ही इस हिन्दूवादी पार्टी को मुस्लिम वोट कम ही मिलने की संभावना व्यक्त की जा रही है, किंतु सत्तारूढ़ भाजपा वह भी खतरा उठाना नहीं चाहती, इसलिए उसने अपने सहयोगी दल के मुखपत्र की सम्पादकीय के प्रति असहमति व्यक्त कर दी।

यद्यपि वैसे राजनीति से ऊपर उठकर देशहित में यदि इस मांग को देखा जाए तो यह कतई गलत नहीं है और श्रीलंका ने भी चेहरा ढंकने पर प्रतिबंध लगाया है, जिसमें बुर्का व घुंघट दोनों शामिल है, किंतु हमारे देश में इसे साम्प्रदायिकता से जोड़ कर देखा जा रहा है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि भारत में तो यह मुद्दा अब सामने आया है, या लाया गया है, जबकि एक दर्जन से भी अधिक देशों में तो चेहरा ढंककर चलने या सरकारी कार्य में भागीदारी करने पर दो दशक पहले से प्रतिबंध है।

कुछ देशों में आंशिक क्षेत्रों में है तो कुछ में पूरे देश में? किंतु इन एक दर्जन देशों में बुर्के या घुंघट को लेकर आज तक कोई विवाद नहीं हुए तो फिर हमारे ही देश में इस मुद्दे को महत्व क्यों दिया जा रहा है? हमारे देश में भी पिछले सालों में जो आतंकी घटनाएं या विस्फोट हुए उनके आरोपी या आतंकी अपना चेहरा ढंके हुए ही देखे गए थे, यहीं नहीं हमारी सीमाओं पर भी जो आतंकी घटनाएं हो रही है, उनमें भी आतंकी नकाब या कपड़े से अपने चेहरे ढंके हुए नजर आए, इसलिए मेरा विश्वास है कि यदि यह मांग सामान्य दौर में (चुनाव के समय नहीं) उठाई जाती तो सरकार इसे तत्काल मान्य कर लेती।

किंतु इन दिनों जब भारत में मतदान के पांच दौर निपटने जा रहे है, ऐसे में सत्तारूढ़ दल कोई राजनीतिक खतरा उठाने को तैयार नहीं है, इसलिए इस मांग को खारिज किया जा रहा है, यद्यपि भोपाल क्षेत्र की भाजपा प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर व केन्द्रीय मंत्री गिरीराज सिंह ने इस मांग का समर्थन किया है, किंतु चुनावों के कारण फिलहाल सत्तारूढ़ दल इस विवाद का पटाक्षेप चाहता है।

….और यदि भविष्य में इस मांग पर सरकार ने विचार भी किया तो उसे बुर्के के साथ घुंघट तथा चेहरा ढंकने वाले सभी प्रसाधनों पर प्रतिबंध लगाने के बारे में सोचना पड़ेगा। किंतु आतंकी घटना को फर्जी वोटिंग से जोड़ना कतई ठीक नहीं कहा जा सकता। क्योंकि हम मतदान केन्द्र पर महिला सुरक्षा कर्मी को बुर्का या घुंघटधारी की जांच की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है, जबकि आतंकी वारदात के समय नहीं।

(साई फीचर्स)