समाज की नई विकृति पर कब होगी चिंता?

 

 

(बलबीर पुंज)

हाल में महिला प्रताड़ना से संबंधित दो मामले सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बने, जोकि दो कारणों से चर्चा में रहे। पहला- दोनों ही मामलों में आरोप देश के चर्चित व्यक्तियों पर लगा। दूसरा- जांच के बाद या फिर अबतक के घटनाक्रमों के आधार पर अब शिकायतकर्ताओं को संदेह की नजर से देखा जा रहा है। न्याय और उपयोगिता- प्रत्येक कानून की कसौटी का मुख्य आधार होता है। इनका मुख्य उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों में सुरक्षा की भावना पैदा करने, कालबाह्य प्रथाओं-परंपराओं से मुक्ति देने, दीर्घकालीक अन्याय के परिमार्जन और उनके खिलाफ होने वाले किसी अपराध को रोकने से जुड़ा होता है। किंतु जब उन्ही कानूनों का दुरुपयोग अपनी महत्वकांशा, लालच, प्रतिशोध और किसी निजी स्वार्थ के लिए किया जाने लगे, तो वह समाज में विकृत रूप धारण कर लेता है। यह हाल के कुछ मामलों ने रेखांकित भी कर दिया है।

विगत दिनों देश के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर उनकी पूर्व महिला सहयोगी ने यौन-उत्पीड़न का आरोप लगा दिया। आरोप है कि जब वह प्रधान न्यायाधीश के आवास स्थित कार्यालय में तैनात थी, तब उस समय उन्होंने उसके साथ अमर्यादित व्यवहार किया। भले ही सर्वाेच्च न्यायालय की आतंरिक जांच में मुख्य न्यायाधीश को क्लीन चिट मिल चुकी है, किंतु महिला संगठनों का एक विशेष वर्ग इसका विरोध अब भी कर रहा है।

इस मामले के संदेहास्पद होने के कई कारण सामने आए है। बकौल मीडिया रिपोर्ट्स, शिकायतकर्ता महिला को गत वर्ष दिसंबर में मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय का दुरुपयोग करने और उसका अनुचित लाभ कमाने की शिकायतों के कारण नौकरी से हटा दिया गया था। उसपर आरोप था कि उसने बाहरी लोगों से गुप्त सूचनाएं साझा की थी। संभवतः यह उसका प्रतिकार हो। इसके अतिरिक्त, मामले में जिस प्रकार किसी भी सुनवाई से पहले देश के कई न्यायाधीशों को 20 पन्नों का हलफनामा भेज गया, उसने भी मामले को संदिग्ध बनाते हुए इसके पीछे की बड़ी साजिश का संकेत दे दिया। यही नहीं, पूरे घटनाक्रम में शिकायतकर्ता महिला को ऐसे चार डिजिटल मीडिया समूह का सहयोग मिल गया, जो संयुक्त रूप से वर्तमान भारतीय नेतृत्व का विरोधी है और समान वैचारिक-राजनीतिक अधिष्ठान का प्रतिनिधित्व भी करते है।

विडंबना है कि मुख्य न्यायाधीश या न्यायिक व्यवस्था को कलंकित करने और देश विरोधी एजेंडे के लिए षड़यंत्रकारी उन कानूनों का दुरूपयोग करने का प्रयास कर रहे है, जो महिला सुरक्षा से संबंधित है और जिसका जन्म कई आंदोलनों और बलिदान के गर्भ से हुआ है। समाज में पनपती इस विकृति को टी.वी. अभिनेता और गायक करण ओबरॉय से जुड़े घटनाक्रम ने और भी पुष्ट कर दिया है।

मुंबई के ओशिवारा थाने में शिकायतकर्ता महिला द्वारा दर्ज प्राथमिकी के अनुसार, अक्टूबर 2016 में एक डेटिंग ऐप्लिकेशन के माध्यम से दोनों की भेंट हुई थी। इसके बाद दोनों दोस्त बन गए। एक दिन करण ने उसे अपने घर मिलने बुलाया। जहां करण ने उनसे शादी का वादा किया और नारियल पानी में नशीला पदार्थ मिलाकर उसे पिला दिया। इसके बाद करण ने उनका बलात्कार किया और उसका वीडियो भी बनाया।

अब करण के बचाव में उसके मित्रों, परिजनों और सहयोगियों ने जो पक्ष रखा है, उसने पूरे मामले को नया ही कोण दे दिया। यह महत्वपूर्ण इसलिए भी है, क्योंकि आरोपी का बचाव करने वालों में पूर्व अभिनेत्री, स्तंभकार और महिला अधिकारों की बात करने वाली पूजा बेदी भी शामिल है। प्रेसवार्ता में बेदी ने दावा किया कि 13 जनवरी 2017 को उस महिला ने करण को एस.एम.एस. के माध्यम से शारीरिक संबंध बनाने का प्रस्ताव भेजा था, जिसमें लिखा था- करण, मैं ओपन और अपफ्रंट हूं। क्या हम फ्यूचर, इमोशंस और किसी और चीज के बारे में सोचे बिना सेक्स कर सकते हैं, क्योंकि मेरी बॉडी को फिलहाल इसकी जरूरत है और मैं किसी और के साथ कम्फर्टेबल नहीं। मुझे बताएं कि इसके बारे में आपकी क्या राय है।

अब शिकायतकर्ता महिला और करण में कौन सच्चा है और कौन झूठा- यह निकट भविष्य में तय होगा। किंतु इस प्रकार के घटनाक्रम से उन महिलाओं का पक्ष अवश्य कमजोर होगा या यूं कहे हो भी रहा है, जो वास्तविक पीड़िता है या प्रतिदिन कामुक और चरित्रहीन पुरुषों का किसी कंपनी, निजी कार्यालय, मॉल, सरकारी दफ्तर या फिर किसी भी निजी आवास में सामना और उसका प्रतिकार करती है।

हाल के वर्षों में देश के भीतर ऐसे कई मामले सामने आए है, जिसमें महिलाओं/युवतियों द्वारा पुरुषों पर शादी का झांसा देकर बलात्कार का आरोप लगाया गया है। इस पृष्ठभूमि में वर्ष 2017 में बॉम्बे उच्च न्यायालय की ऐसे ही एक मामले में की गई टिप्पणी महत्वपूर्ण है, जिसमें न्यायाधीश मृदुला भटकर ने कहा था- समाज बदल रहा है। पहले जहां शादी से पहले महिलाएं कुंवारी रहती थीं, किंतु आज की पीढ़ी खुलकर जी रही है और सेक्स पर खुलकर बात करती है। कुछ महिलाएं बदलते समाज को अपना तो रही हैं, लेकिन अपनी जिम्मेदारियों से भाग भी रही हैं, क्योंकि यदि कोई लड़की किसी लड़के से प्रेम करती है और फिर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाती है, तो वह भूल जाती है कि संबंध बनाने में उसकी सहमति भी शामिल थी, लेकिन लड़की बाद में अपने उस फैसले की जिम्मेदारी लेने से बचती है।

वर्ष 2016 में महिलाओं को मुंबई स्थित सुप्रसिद्ध हाजी अली दरगाह की मजार तक जाने की अनुमति देने वाली बॉम्बे उच्च न्यायालय की खंडपीड के सदस्य, महिला अधिकारों के पैरोकार और प्रख्यात सेवानिवृत न्यायाधीश वी.एम. कनाडे ने एक अंग्रेजी समाचारपत्र को दिए साक्षात्कार में बलात्कार विरोधी कानूनों के दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त की है। उनके अनुसार, ष्ऐसे मामलों में ललिता कुमारी बनाम उत्तरप्रदेश राज्य पर संज्ञान लेने की आवश्यकता है। इस निर्णय में कहा गया है कि एक बार जब पुलिस को संज्ञेय अपराध की सूचना दी जाती है, तब उनके पास प्राथमिकी दर्ज करने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं होता है। किंतु जब ऐसे मामले आए, जिसमें बलात्कार का आरोप देरी से लगाया गया हो या फिर एक अवधि के बाद किसी का संबंध टूट गया हो, जिसमें आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाए गए हो- उसमें पुलिस को तुरंत गिरफ्तारी से पहले प्रारंभिक जांच करनी चाहिए।

विडंबना देखिए, यदि पुरुष किसी प्रेम-संबंध में शादी का वादा तोड़ता है (जिसमें आपसी सहमति से शारीरिक संबंध तक बनाए गए हो) और महिला उसे मनाने का हरसंभव प्रयास करती है, तब समाज में पूरा घटनाक्रम महिला शोषण और शादी का झांसा देकर बलात्कार करने का बन जाता है। किंतु महिला किसी भी कारण रिश्ता तोड़ती है और पुरुष उसे मनाने की कोशिश करता है, तब भारतीय दंड संहित 354घ के अतंर्गत उस महिला को अपने प्रेमी पर पीछा करने का आरोप लगाने का वैधानिक अधिकार प्राप्त होता है। क्या ऐसी विकृति प्रबुद्ध समाज को स्वीकार्य है?

अक्सर देखा गया है कि जब भी समाज में महिला से संबंधित यौन-शोषण और बलात्कार का मामला सामने आता है, तब स्वाभाविक रूप से एकाएक आरोपी के प्रति आक्रोश और पीड़िता के प्रति संवेदना का भाव उमड़ आता है। ऐसा गत वर्ष दिसंबर में उत्तरप्रदेश के नोएडा निवासी और गुरुग्राम की एक कंपनी में कार्यरत सहायक-उपाध्यक्ष स्वरूपराज के मामले में भी देखनों को मिला था। स्वरूपराज पर उनकी दो महिला सहयोगियों ने यौन-उत्पीड़न का आरोप लगाया था। उस समय कंपनी ने स्वरूपराज का पक्ष जाने बिना उन्हे तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। इस घटना से परेशान होकर उसने उसी दिन अपने घर पर आत्महत्या कर ली। पत्नी के नाम लिखे अंतिम संदेश में स्वरूपराज ने स्वयं को निर्दाेष बताया और कहा, इन निराधार आरोपों के बाद वह किसी का सामना नहीं कर पाएगा। अब मामले की पुलिस जांच कर रही है कि क्या स्वरूपराज पर महिला यौन-उत्पीड़न का आरोप किसी साजिश का हिस्सा तो नहीं था?

यह सत्य है कि दहेज प्रथा, बाल-विवाह, महिला उत्पीड़न, शारीरिक-मानसिक शोषण, घरेलू हिंसा और बलात्कार जैसे घिनौने अपराध भारतीय समाज के लिए कलंक है, जिसके विरूद्ध देश में कई कानूनों का या तो कालांतर में निर्माण हुआ है, तो कई पुराने कानूनों को और अधिक सशक्त भी किया गया है। इन्हीं कानूनी कवच के कारण समाज में महिलाओं की स्थिति पहले की तुलना कहीं अधिक मजबूत हुई है और अनेकों वास्तविक पीड़िताओं को इसके माध्यम से न्याय भी मिला है। किंतु एक कटु सत्य यह भी है कि पाश्चात्य वातावरण से जकड़े आज के समाज में कुछ महिलाए इतनी महत्वकांशी हो गई है कि वह अपने निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति हेतु किसी भी सीमा तक जाने को तत्पर रहती है।

(साई फीचर्स)

19 thoughts on “समाज की नई विकृति पर कब होगी चिंता?

  1. Hurtful all things can arise with accept existent cialis online decrease of the internet, the heart is necrotizing with discontinuation of the setting have demonstrated acutely done with in making the urine gram stain online. tadalafil generic tadalafil 10 mg

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *