पोला : मवेशियों के प्रति स्नेह का है त्यौहार

 

 

किसानों में पोला को लेकर है जमकर उत्साह

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। त्यौहारों की शुरूआत जन्माष्टमी के साथ ही आरंभ हो गई है। पशुओं के प्रति स्नेह और उनके प्रति सम्मान को दर्शाने का पर्व पोला 30 सितंबर को मनाया जाएगा। जिले भर में पोला एवं उसके बाद तीजा को व्यापक स्तर पर मनाने के लिए तैयारियां शुरू कर दी है।

एक समय था जब पोला पर्व पर छोटे छोटे बच्चों के द्वारा लकड़ी के पहिये लगे बैलों को रस्सी से बांधकर चलाया जाता था। इसके अलावा किसानों के द्वारा अपने मवेशियों को रंग से बहुत ही सुंदर तरीके से सजाया जाता था। समय के साथ इन सारी चीजों पर विराम लगता चला गया।

भारत समेत कृषि प्रधान जिले में कृषि को अच्छा बनाने में मवेशियों का भी विशेष योगदान होता है। जिसके चलते किसान, पशु पालक मवेशियों की पूजा करते हैं। पोला का त्योहार उन्हीं में से एक है, इस दिन कृषक गाय, बैलों की पूजा करते हैं। किसान और अन्य लोग पशुओं की विशेष रूप से बैल की पूजा करते हैं। किसान इस दिन अपने बैलों को बहुत ही अच्छी तरह से सजाते हैं।

पं. राघवेन्द्र शास्त्री ने बताया कि विष्णु भगवान जब कान्हा के रूप में धरती में आए थे, जिसे कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है। तब जन्म से ही उनके कंस मामा उनकी जान के दुश्मन बने हुए थे। कान्हा जब छोटे थे और वासुदेव-यशोदा के यहां रहते थे, तब कंस ने कई बार कई असुरों को उन्हें मारने भेजा था। एक बार कंस ने पोलासुर नामक असुर को भेजा था, इसे भी कृष्ण ने अपनी लीला के चलते मार दिया था और सबको अचंभित कर दिया था। वह दिन भादों माह की अमावस्या का दिन था, इस दिन से इसे पोला कहा जाने लगा। यह दिन बच्चों का दिन कहा जाता है।

उन्होंने बताया कि इसके साथ ही यहां कृषि आय का मुख्य स्रोत है और ज्यादातर किसानों की खेती के लिए बैलों का प्रयोग किया जाता है। इसलिए किसान पशुओं की पूजा आराधना एवं उनको धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए भी इस त्योहार को मनाते हैं। पोला दो तरह से मनाया जाता है, बड़ा पोला एवं छोटा पोला। बड़ा पोला में बैल को सजाकर उसकी पूजा की जाती है, जबकि छोटा पोला में बच्चे खिलौने के बैल या घोड़े को मोहल्ले पड़ोस में घर-घर ले जाते हैं और फिर कुछ पैसे या उपहार उन्हें दिए जाते हैं।

किसानों ने बताया पोला के पहले दिन किसान अपने बैलों के गले एवं मुंह से रस्सी निकाल देते हैं। इसके बाद उन्हें हल्दी, बेसन का लेप लगाते हैं, तेल से उनकी मालिश की जाती है। इसके बाद उन्हें गर्म पानी से अच्छे से नहलाया जाता है या फिर समीप की नदी-नालो में लेजाकर नहलाया जाता है।

किसानों की मानें तो इसके उपरांत उन्हें बाजरा से बनी खिचड़ी खिलाई जाती है। इसके बाद बैल को अच्छे से सजाया जाता है, उनकी सींग को कलर किया जाता है। इस दिन का मुख्य उद्देश्य ये है कि बैलों के सींग में बंधी पुरानी रस्सी को बदलकर, नए तरीके से बांधा जाता है।

परंपरा के अनुसार गांव के सभी लोग एक जगह इक्कठे होते हैं और अपने-अपने पशुओं को सजाकर लाते हैं। इस दिन सबको अपनी बैलों को दिखाने का मौका मिलता है। अनेक गांवों में इस दिन मेले भी लगाए जाते हैं, यहां तरह तरह की प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं। पोला का त्योहार हर इंसान को जानवरों का सम्मान करना सिखाता है।

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