राहु का सूर्य और चन्द्र को ग्रास बनाने के प्रयास के कारण ही लगता है ग्रहण . . .

समुद्र मंथन के दौरान निकले अमृत को मोहनी ने परोसा देवताओं को और . . .
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पिछले एपीसोड में आपने सुना कि सागर मंथन के दौरान देवताओं और असुरों के द्वारा मंदरांचल पर्वत के जरिए यह कार्य किया था। अब इसके आगे की कथा सुनिए,
मान्यता के अनुसार देवराज इन्द्र ने अपने पुत्र जयन्त को निर्देश दिया कि वो अमृत कलश को प्राप्त करके उसकी रक्षा करें। पिता के आदेश के अनुसार जयन्त ने कुम्भ अमृत कलश को प्राप्त किया और पूरे ब्रम्हाण्ड में दौड़ने लगा, साथ ही असुरों ने भी बारह दिनों तक उसका पीछा किया। जयन्त ने बारह बार रूक-रूक कर विश्राम किया जिसमें चार बार पृथ्वी, चार बार स्वर्ग व चार बार पाताल लोक का वर्णन है। प्रत्येक विश्राम-स्थल पर अमृत की कुछ बूंदें छलक गयीं। पीछा करते हुएअसुरों ने अमृत कुम्भ को छीन लिया और आपस में ही द्वंद्व करने लगे कि उनमें से पहले कौन अमृतपान करेगा, इसी द्वंद्व के मध्य में मोहिनी एकदिव्य सौन्दर्य की स्वामिनी व जिसका वर्णन शब्दों में भी नहीं किया जा सकता, प्रकट हुईं।
अगर आप भगवान शिव जी, भगवान विष्णु जी एवं भगवान श्री कृष्ण जी की अराधना करते हैं और अगर आप विष्णु जी एवं भगवान कृष्ण जी के भक्त हैं तो कमेंट बाक्स में ओम नमः शिवाय, जय विष्णु देवा, जय श्री कृष्ण, हरिओम तत सत, ओम नमो भगवते वासुदेवाय नमः लिखना न भूलिए।
जानकारों के अनुसार मान्यता के अनुसार मोहिनी के आकर्षक सौन्दर्य को देखकर असुरों की मति फिर गयी और उनमें से एक ने अमृत कलश लेकर मोहिनी से कहा कि अब आप ही निर्धारित करिये कि हम लोगों में अमृत किस प्रकार बांटा जाये। मोहिनी मुस्कुराई और असुरों ने उसके द्वारा होने वाले निर्णय पर अपना विश्वास जताया। मोहिनी ने कहा कि देवताओं और असुरों ने एक समान कठिन परिश्रम किया है, इसलिए दोनों पक्षों का अमृत पर अधिकार भी समान होना चाहिए। उसने दोनों पक्षों को दो पंक्तियों में विभाजित किया और अपनी आँखें बन्द कर लेने को कहा।
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मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु के इस अवतरित मायावी रूप ने कलश लेकर सर्वप्रथम देवताओं को अमृत परोसा। समस्त देवताओं को अमृत परोसने के पश्चात् मोहिनी अन्तर्ध्यान हो गयी। जब असुर मतिभ्रम से जागे तब उन्हें ज्ञात हुआ कि वे तो छले गये हैं। अमृत से देवताओं ने पुन अपने को शक्तिशाली बनाया व चल रहे संघर्ष में भी विजय प्राप्त की जिससे ब्रम्हाण्ड में धर्म की पुन उचित स्थापना हुई।
इसी संघर्ष के बीच राहु वेष बदलकर चुपके से देवताओं की पंक्ति में प्रविष्ट हो गया था और इससे पहले कि वे पहचाने जाते उन्होंने अमृत की एक बूँद प्राप्त कर ली। भगवान विष्णु ने तत्काल अपना सुदर्शन चक्र चलाया जिसने उस असुर का सिर धड़ से अलग कर दिया जिससे अमृत उसके शरीर में नहीं पहुँच पाया। राहु का मृत शरीर गिर पड़ा परन्तु चक्र ने उसके न मरने वाले सिर को अंतरिक्ष में उछाल दिया। अब राहु बदला लेने वाला एक ग्रह बनकर सूर्य और चन्द्र के मध्य रहने लगे।
धार्मिक मान्यता के अनुसार राहु का सूर्य और चन्द्र को ग्रास बनाने के प्रयास के कारण ग्रहण भी लगता है। देवताओं के बारह दिन और मनुष्य के बारह वर्ष एक समान हैं, इसलिए कुम्भ पर्व हर बारह साल पर आयोजित होता है। ग्रहों के देवता सूर्य, चन्द्र और बृहस्पति ने जयन्त की रक्षा की व अमृत कलश को भी सुरक्षा प्रदान की। अंतरिक्ष शास्त्र के अनुसार ये तीनों सूर्य, चन्द्र और बृहस्पति कुम्भपर्व पर एक साथ उपस्थित होकर मनुष्य जाति को अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
भारत में हरिद्वार, प्रयाग, नासिक व उज्जैन की इन चार क्रमश पवित्र नदियों गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम, गोदावरी एवं क्षिप्रा में अमृत छलका था, इसलिए ये चारों स्थान पवित्र कुम्भ पर्व के केंद्र माने गये हैं। श्रीमदभागवत में महर्षि दुर्वासा की कथा का एक संक्षिप्त उल्लेख मिलता है, जिसके अनुसार देवताओं के राजा इन्द्र को महर्षि दुर्वासा द्वारा अपनी माला उपहार में दिये जाने पर इन्द्र ने उसे अपनी सवारी ऐरावत हाथी के मस्तक पर फेंक दिया जिसे ऐरावत ने अपने पैरों से कुचल दिया।
कथा के अनुसार महर्षि दुर्वासा ने इसे अपना अपमान समझकर इन्द्र को श्री विहीन होने का शाप दे डाला। इसके परिणामस्वरूप इन्द्र युद्ध में राक्षसों से पराजित हो अपनी शक्ति, वैभव व राज्य खो बैठे। तदुपरान्त भगवान श्री नारायण से प्रार्थना करने पर उन्हें समुद्र की गहराई में छिपे अमृत को निकालने के लिए समुद्र मंथन की युक्ति सुझाई गयी।
इस कथा का एक और विस्तार हमें महाभारत और संक्षिप्त महाभारत में भी मिलता है जिसमें भगवान विष्णु और ब्रम्हा जी का सुमेरू पर्वत पर अमृत के आविष्कार के लिए एकत्र होना बताया गया है, जहां भगवान विष्णु ने देवताओं और दानवों को समुद्र दोहन के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी तथा वासुकि नाग को रस्सी बनाकर समुद्र को मथने का सुझाव दिया।
भगवान विष्णु ने स्वयं कच्छप का रूप धारण कर मंदराचल पर्वत को आधार प्रदान किया व उसका संतुलन बनाये रखने का कार्य किया। समुद्र मथने पर समुद्र की अथाह जलराशि का रंग दूध के समान श्वेत हो गया। मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों के क्रम में भगवती लक्ष्मी, सुरा देवी, चन्द्रमा और अंत में भगवान धन्वन्तरि अमृत भरा श्वेत कलश हाथों में लिए प्रकट हुए।
मत्स्य पुराण और विष्णु पुराण में सात द्वीपों का वर्णन मिलता है जम्बूद्वीप, शाक द्वीप, कुश द्वीप, क्रौंच द्वीप, शाल्मल द्वीप, गोमेद द्वीप और पुष्कर द्वीप जिनमें शाक द्वीप के वर्णन में मत्स्य पुराण के अनुसार इस द्वीप में सात बड़ी नदियां हैं जो पवित्रता में गंगा के समान हैं।
पहले समुद्र में मणियों से सुशोभित सात पर्वत हैं, उनमें से कुछ पर देव और कुछ पर दानव रहते हैं। इनमें से एक सोने का ऊँचा पहाड़ है जहां से वर्षा लाने वाले मेघ उठते हैं, दूसरे औषधियों का भण्डार है, राजा इन्द्र इनसे वर्षा लेता है। कद्रु-विनता की कथा समुद्र मंथन से प्राप्त कलश में रखे अमृत प्राप्ति के बाद की घटना से सम्बन्धित है।
इसके अनुसार महर्षि कश्यप सप्तऋषियों में से एक उनकी 13 पत्नियों में दो पत्नियां कद्रु और विनता जुड़वां बहनें थीं, कद्रु सांपों की माता थीं और विनता पक्षियों और गरुड़ की माता थीं। यह दोनों में आपसी मतभेद को लेकर शर्त लगाकर दासी होने और उससे छुटकारा के लिए देवताओं द्वारा छुपाये गये अमृत की खोज से सम्बन्धित कथा है।
दोनों बहनें एक मैदान में रहती थीं, उन्होंने भ्रमण करते समय आकाश मार्ग से जाते हुए सात मुँह वाले श्वेत अश्व को देखा और उसके पूँछ के रंग को लेकर शर्त लगायी। कद्रु ने पूँछ का रंग काला होने की बात कही और. विनीता ने पूँछ का रंग सफेद बताया। अब उन्होंने शर्त लगायी कि जिसकी बात असत्य निकले वह दूसरी की दासी बनकर रहेगी। परन्तु उन्होंने निर्णय अगले दिन पर छोड़ दिया।
रात को सांपों की माता ने अपने काले बच्चों को घोड़े के पास भेजा ताकि वे उसकी पूँछ पर लिपटकर उसके रंग को छिपा दें। इसका परिणाम यह हुआ कि कटु के सर्प पुत्रों ने घोड़े की पूँछ पर लिपटकर उसके काला होने का भ्रम उत्पन्न कर दिया जिससे कद्रु जीत गयी और विनता को दासी बनना पड़ा। माँ को दासत्व से मुक्ति दिलाने के लिए उसके पुत्र गरुड़ ने अमृत खोजकर सर्पों को देने की बात स्वीकार कर ली।
अमृत को देवताओं के राजा इन्द्र ने संरक्षित कर रखा था। वो गरुड़ को अमृत कलश इस बात पर देने को सहमत हो गये कि वे इसे सर्पों को नहीं पिलायेंगे, परन्तु गरुड़ ने अमृत कुम्भ सपों को सौंपकर अपनी माँ को दासत्व से मुक्ति दिलायी। इसके बाद गरुड़ ने सर्पों से कहा कि जब तक तुम गंगा में स्नान न कर लो, अमृत के निकट न आना। सर्प स्नान करने चले गये। इसी बीच में गरुड़ इसे देवों के पास वापस ले आया, जिससे उसकी पवित्रता की पदवी बहुत ऊँची हो गयी और वह सब पक्षियों का राजा और विष्णु का वाहन बन गया। हरि ओम,
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प्रीति भौसले

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