निर्मल भाव से पहुँचे सुदामा को भगवान का मिला सानिध्य

 

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। ग्राम मेहराबोडी में चल रही कथा अमृत मंथन के अंतर्गत श्रीमद्भागवत कथा में गत दिवस आवाहित देवी देवताओं का पूर्ण पूजन और व्यास पूजा के बाद अपने प्रवचनों में आचार्य महेंद्र मिश्र ने प्रद्दुम्न का जन्म और उसके हरण की कथा के साथ, भगवान श्रीकृष्ण को मणि की चोरी का मिथ्या कलंक का वृतांत बताया।

उन्होंने आगे कहा कि भगवान कृष्ण ने कालिंदी आदि आठ कन्याओं से विवाह और भौमासुर का वध कर उसके कैद से मुक्त कराया, सोलह हजार एक सौ कन्याओं से विवाह किया। राजा नृग की कथा के बाद नारद को ग्रहस्थ लीला का भिन्न – भिन्न रूप दिखाया।

सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए बताया शुकदेवजी ने सुदामा का चरित्र सुनाया, भागवत की कथा करते हुए शुकदेवजी दोबारा समाधिस्थ हो गये थे। उस समय अन्य ऋषियों ने वेद मन्त्रों के द्वारा उनको सचेत किया था।

सुदामाजी की कथा व्याख्या के दौरान, सचित्र जीवंत बाल कलाकारों की भूमिकाओं के साथ एक नवीन चित्रण कथा मंच पर प्रस्तूति भी किया गया जिसे देखकर लोग आनन्द से विभोर हो गये।

पहली समाधी शुकदेवजी की तब लगी जब श्रीकृष्ण ने गोप बालक, गाय, बछड़ों आदि का रूप लेकर ब्रम्हा को अपनी माया का दर्शन कराया था और दूसरी बार सुदामा चरित्र के समय बताया। सुदामा महाज्ञानी कृष्ण के मित्र हैं, वे सारे दिन प्रभु सेवा में विताते थे। सुदामा जब निर्मल भाव में आये तो भगवान की सानिध्य प्राप्त हुई। कथा में उदासी अखाड़ा के सन्त बालक दास भी उपस्थित थे।

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