गांवों में बदहाल पुस्तकालयों के बीच आशा की नई किरण

(राष्ट्रीय पुस्तकालय सप्ताह विशेष 14-20 नवंबर 2021)
(डॉ. प्रितम भि. गेडाम)


हमारे देश में दशकों से “गांव वहा पुस्तकालय” की संकल्पना का सपना आज तक पूरा नहीं हो पाया है, यह सपना शत प्रतिशत कब पूरा होगा, कहना मुश्किल है। देश की 65.07 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है, देश में इस समय अनेक पुस्तकालय खंडहर में तब्दील होने की कगार पर हैं, जहां पुस्तकों के रूप में अमूल्य धरोहर, पांडुलिपियाँ, संसाधन, फर्निचर, इमारत जीर्ण अवस्था में होने के कारण वह कई समस्याओं से जूझ रहे है। बारिश और बाढ़ के कारण कई पुस्तकालयों में पानी भर जाता है। पुस्तकालयों में उचित रख-रखाव की भारी कमी है और ऐसे पुस्तकालयों से मूलभूत सुविधाएं मिलना तो दूर, उपलब्ध साहित्य को सहेजना भी मुश्किल है।

2011 की जनगणना के अनुसार, पुस्तकालयों को पहली बार अधिसूचित किया गया था, 83 करोड़ की आबादी वाले ग्रामीण क्षेत्रों में 70,817 पुस्तकालय और 37 करोड़ से अधिक की आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में 4,580 पुस्तकालय थे। ये संख्या प्रत्येक 11,500 लोगों के लिए लगभग एक ग्रामीण पुस्तकालय और 80,000 से अधिक लोगों के लिए एक शहरी पुस्तकालय का प्रतिनिधित्व करती है। अफ्रीका, एशिया और दक्षिण अमेरिका के कई विकासशील देश अपने सार्वजनिक पुस्तकालयों पर प्रति व्यक्ति बहुत कम खर्च करते हैं, यू.एस. में, सार्वजनिक पुस्तकालय प्रणाली कुल जनसंख्या के 95.6 प्रतिशत को सेवा प्रदान करती है और प्रति व्यक्ति सालाना 35.96 डॉलर खर्च करती है, जबकि भारत में, सार्वजनिक पुस्तकालयों के विकास पर प्रति व्यक्ति खर्च 7 पैसे दर्शाया गया था।

ग्रामीण भारत में स्कूल पुस्तकालयों की वास्तविकता, शिक्षा की वार्षिक स्थिति रिपोर्ट (ग्रामीण) 2014, असर अनुसार, ग्रामीण भारत में स्कूल पुस्तकालय उपेक्षा में हैं। पुस्तकालयों वाले स्कूलों का अनुपात 2010 में 62.6 प्रतिशत से बढ़कर 2014 में 78.1 प्रतिशत हो गया है और निश्चित रूप से, पिछले पांच वर्षों में, देश के सभी राज्यों (उत्तर भारतीय राज्यों को छोड़कर) में स्थितियों में सुधार हुआ है। इसके बावजूद ग्रामीण भारत में फैले 21.9 फीसदी स्कूल ऐसे हैं जिनमें पुस्तकालय जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं। चट्टोपाध्याय समिति ने एक बार टिप्पणी की थी कि “कोई पुस्तकालय नहीं, कोई स्कूल नहीं”। इन शब्दों में, 21.9 प्रतिशत विद्यालयों को कभी विद्यालय नहीं कहा जा सकता। भारत में एक भी राज्य ऐसा नहीं है जहां सभी स्कूलों में पुस्तकालय हों। पुस्तकालयों वाले स्कूलों का अनुपात 2014 में 78.1 प्रतिशत से गिरकर 2016 में 75.5 प्रतिशत हो गया है।

देश में पुस्तकालयों से जुड़ी समस्या भले ही चिंताजनक हो, खासकर ग्रामीण इलाकों में, लेकिन आज भी हमारे देश में आशा की नई किरण लेकर दूरदराज इलाकों में भी ज्ञान की लौ जलाने के लिए विपरीत परिस्थितियों से होकर पुस्तकालयों को बढ़ावा दिया जा रहा है। समस्याओं से घिरकर भी लोगों में ज्ञान प्रवाहित करने के लिए निस्वार्थ भाव से कार्य करनेवाले ऐसे समाजसेवियों को मानवता का सलाम है।

मैसूर के सैयद इशहाक ने समाजसेवा के उद्देश्य से 11 हजार पुस्तकें एकत्र कर पुस्तकालय का निर्माण किया, वे स्वयं कभी नहीं पढ़ सके लेकिन लोगों के लिए ज्ञान का केंद्र स्थापित किया। लेकिन अप्रैल के महीने में समाज के कुछ असामाजिक तत्वों ने उनके पुस्तकालयों को जला दिया, परंतु इस स्थिति में भी उन्होंने हार नहीं मानी और पुस्तकालय के निर्माण का काम फिर से शुरू कर दिया, पुस्तकालय के निर्माण के लिए दान के रूप में देश भर से पुस्तकें आने लगीं साथ ही यूएसए, कनाडा, इंग्लैंड, दुबई और कई अन्य देशों से किताबें आई हैं। अब वे जल्द ही एक नए पुस्तकालय के सपने को साकार करेंगे।

केरल के जंगलों के बीच बसे एडमलक्कुडी में रहने वाले आदिवासी लोगों के लिए अपने आसपास पुस्तकालय एक सपने जैसा था, लेकिन अब इस कस्बे की एक छोटी सी चाय की दुकान पर एक पुस्तकालय “अक्षरा” स्थापित किया गया है। वन क्षेत्र के बीच में स्थित यह दुनिया का अनूठा पुस्तकालय है जहां केवल पैदल ही पहुंचा जा सकता था। हालांकि, एडमलक्कुडी मे पहली बार इस साल मार्च में जीप पहुंची है। यह पुस्तकालय इतना मशहूर हुआ कि पीएम मोदी ने खुद अपने कार्यक्रम मन की बात में इस पुस्तकालय का जिक्र कर तारीफ की।

राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में जिला प्रशासन और एक गैर सरकारी संगठन की मदद से ऊंटगाड़ी पर पुस्तकालय (मोबाइल लाइब्रेरी) का आयोजन किया है। क्षेत्र के ऐसे गांव जहां न तो ठीक से यातायात के साधन हैं और न ही उचित सड़कें। ऐसे गांवों में बच्चों की शिक्षा को सुलभ बनाने के लिए ऊँटगाड़ियों पर मोबाइल लाइब्रेरी शुरू करना अत्यंत प्रशंसनीय है। पुस्तकालय में बच्चों को आकर्षित करने के लिए कई सचित्र पुस्तकें हैं, जो उनके सीखने के कला- गुणों को और अधिक निखारने मे सहायक है। बच्चों के लिए भी यह एक बेहद रोचक विषय है, रंग-बिरंगी किताबें और सजी हुई ऊँट गाड़ियां अपने बीच पाकर गांव के बच्चे बहुत खुश होकर पुस्तकें पढते है।

महाराष्ट्र के सातारा जिले में “किताबों के गांव” से भीलर गांव मशहूर है जहां अमूमन हर तरफ पुस्तकालय ही पुस्तकालय नजर आते है। इसे अब बुक विलेज के नाम से जाना जाता है और पर्यटकों के बीच बहुत लोकप्रिय है। लगभग हर घर में पुस्तकालय की स्थापना कर यहां दूसरों के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण स्थापित किया है। दूर-दूर से पाठक यहां आकर इन किताबों को पढ़ने में घंटों बिताते हैं।

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन एवं पथ फाउंडेशन के अंतर्गत रायबरेली जिले के बछरावां ब्लॉक के कन्नावा गांव में आशाओं को अद्ययावत रखने के लिए ऐसा पुस्तकालय बनाया गया है, जहां 27 गांवों की आशाबहुवों को अपने काम से संबंधित जानकारी व सरकारी योजनाओं में आवेदन करने में मार्गदर्शन किया जाता है। यह पुस्तकालय आशाओं के साथ ही ग्रामीण महिलाओं को साक्षरता से जोड़ने और उन्हें वैश्विक स्तर के ज्ञान, विकास, गतिविधीयो से रूबरू करवाना ही इसका उद्देश्य है।

नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (नाबार्ड) द्वारा उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के अर्जुनाह गाँव में एक ग्रामीण पुस्तकालय की स्थापना की गई है। इस पुस्तकालय में गांव के किसानों के लिए बागवानी, फसल, फलों की जानकारी, खेती से संबंधित, दूध उत्पादन और व्यवसाय जैसे सभी प्रकार के विषयों पर ज्ञानवर्धक पुस्तकें उपलब्ध हैं।

मंडला जिले की प्रत्येक ग्राम पंचायत में इन दिनों जुगाड़ से पुस्तकालय का निर्माण किया गया है। जुगाड़ भी ऐसा है कि ग्राम पंचायतों में हर घर की रद्दी कॉपी किताबों को सजाया गया है, गांव-गांव शहर-शहर एक ज्ञान का रथ चल रहा है, ये गाड़ी घरों से किताबों को संग्रहित कर नगर पालिका में रख रही है। इसके बाद ये किताबें गांव के ग्राम पंचायतों में जाकर पुस्तकालयों में रखी जा रही है। यह ज्ञान आधारित योजना जिले में मंडला कलेक्टर द्वारा शुरू की गई है, जिसका उद्देश्य यह है कि जो ग्रामीण नई-नई चीजें पढ़ना-लिखना चाहते हैं, वे यहां आकर आराम से पढ़-लिख सकते हैं।

“पुस्तक दान अभियान” बिहार के पूर्णिया जिले के डीएम द्वारा चलाया गया, जिसमें लोग भरपूर सहयोग कर रहे है जिससे जिले में 150 से अधिक पुस्तकालय खोले गये है, अभी भी लगातार लोग इस अभियान से जुड़ते चले जा रहे है। लोग अपने घरों में पुस्तकें न सजाकर किताब दान अभियान में खुलकर अपनी पुस्तकें दान कर रहे हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्र के जरूरतमंद लोगों को अधिक सुविधा व लाभ मिले।

लाइब्रेरी ऑन व्हील, स्ट्रीट लाइब्रेरी की संकल्पना भी खूब चल पड़ी है, ऐसे अनेक लोग अपने-अपने स्तर पर ग्रामीण क्षेत्रों में पुस्तकालयों के माध्यम से विकास की गंगा प्रवाहित करने के लिए कार्य कर रहे है और वास्तव में हमें ग्रामीण क्षेत्रों में इस तरह के विकास की बेहद जरूरत है जो शिक्षा व देश को प्रगति पथ पर ले जाएं। ग्रामीण आबादी आज भी बुनियादी जानकारी की जरूरत से कोसों दूर नजर आती हैं। ज्ञान आधारित समाज में भाग लेने के लिए ग्रामीण लोगों के जीवन की गुणवत्ता, क्षमता में सुधार के लिए और ग्रामीण समुदाय के उत्थान के लिए ग्रामीण पुस्तकालय की बहुत आवश्यकता है।