जल संकट की आहट

(शरद खरे)

अभी जनवरी माह का पहला पखवाड़ा भी नहीं बीता है और जिले के अनेक अंचलों से जल संकट की पदचाप सुनायी देने लगी है, जिसे शुभ संकेत नहीं माना जा सकता है। जिले में अनेक गाँवों में भूमिगत जल स्तर चिंताजनक स्थिति तक पहुँच चुका है। इसका कारण भूमिगत जल का वाटर रिचार्जिंंग सिस्टम का उचित तरीके से नहीं होना ही प्रमुख कारण है।

पानी का स्तर दिनों दिन गिरना तय है। आबादी जिस तरीके से बढ़ रही है और शहरों, गावों में कांक्रीट के जंगलों की स्थापना हो रही है, उससे बारिश का पानी जमीन में उचित तरीके से नहीं पहुँच पा रहा है। बारिश का पानी जमीन सोख नहीं पा रही है, जिसके चलते नालों आदि के माध्यम से यह बह जाता है।

जिले में जल संसाधन विभाग के मुख्य अभियंता का कार्यालय भी है। जल संसाधन विभाग को चाहिये कि जमीन के अंदर पानी का संचय किस तरह से ज्यादा से ज्यादा किया जाये, उसकी ठोस कार्य योजना न केवल बनायी जाये वरन उसे अमली जामा कैसे पहनाया जाये इस पर विचार भी जरूरी है।

वर्तमान में हो यह रहा है कि भवन निर्माण की अनुमति रेन वाटर हार्वेस्टिंग के साथ मिल जाती है पर स्थानीय निकायों या पंचायतों के द्वारा मौका मुआयना कर इस बात की तस्दीक तक नहीं की जाती है कि भवन में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम सही तरीके से लगाकर उसे आरंभ कराया गया है अथवा नहीं।

जिला प्रशासन को चाहिये कि सबसे पहले वह सरकारी कार्यालयों के भवनों, भले ही वे किराये के भवनों में लग रहे हों, में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम न केवल अनिवार्य किया जाये वरन भवन का भौतिक सत्यापन करवाया जाकर यह भी देखा जाये कि यह व्यवस्था कागजों पर है अथवा इसे वाकई में लगाया भी गया है।

सिवनी जिले में पहले औसतन सौ डेढ़ सौ फीट पर पानी मिल जाया करता था। आज जल स्तर का औसत छः सात सौ फीट से ज्यादा नीचे ही आ रहा है। यह संकेत चिंताजनक ही माने जा सकते हैं। ग्राऊंड वाटर को रीचार्ज करने के लिये संजीदगी से प्रयास करने की आवश्यकता है।

जिला प्रशासन से अपेक्षा है कि गर्मी के मौसम में जिले में खुदे तालाबों के गहरीकरण हेतु ठोस कार्य योजना अभी से बना ली जाये, ताकि ग्रीष्म ऋतु में जल स्त्रोतों में बारिश का ज्यादा से ज्यादा पानी एकत्र किया जा सके। शासन-प्रशासन में अधिकारी-कर्मचारी जिस तरीके से काम कर रहे हैं, उसे देखते हुये सतर्कता भी बरतना आवश्यक ही होगा कि ये सब कुछ कागजों पर ही न हो जाये, जमीनी स्तर पर तालाबों और अन्य जल स्त्रोतों का गहरीकरण किया जायेगा तब ही इसके परिणाम सामने आ सकते हैं।



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