बच्चों की पिटाई को प्यार मानना कब छोड़ेंगे

(ऋतु सारस्वत)

सोशल मीडिया पर पिछले दिनों तीन साल की बच्ची का एक विडियो वायरल हुआ जिसमें एक महिला उसे डांटते हुए गिनती सिखा रही है। विडियो में बच्ची डरी हुई और रोती हुई दिखाई दे रही है। पर इतना ही नहीं, खुद के प्रति ऐसे व्यवहार से उसके भीतर गुस्सा भरा हुआ था जो विडियो में उसके व्यवहार में भी दिख रहा था। बाद में बॉलिवुड सिंगर तोशी साबरी ने बताया कि विडियो में दिख रही बच्ची उनकी भांजी है। बकौल तोशी, मेरी बहन ने हया को पढ़ाते वक्त विडियो इसलिए शूट किया था ताकि फैमिली वाट्सऐप ग्रुप पर भेज कर बता सके कि हया कितनी शरारती हो गई है। हया बहुत जिद्दी है और घर भर की लाड़ली है लेकिन अगर उसकी जिद और लाड़ के चलते उसे छूट दे दी जाए तो फिर वह पढ़ाई कैसे करेगी?

पर क्या बच्चे को पढ़ाने का यह तरीका जायज है? बच्चे के जिद्दी होने पर उसको इस तरह प्रताड़ित किया जाना उचित है? ये वे प्रश्न हैं जिनका उत्तर खोजना बेहद जरूरी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि अभिभावक बच्चों के शुभचिंतक होते हैं, परंतु शुभचिंतक होने का यह मतलब नहीं कि बच्चे उनके बनाए खाकों के भीतर ही चलें। यूनिवर्सिटी ऑफ मिसौरी के शोधकर्ताओं ने अपने शोध में बताया कि बचपन में शारीरिक दंड बच्चों को भावनात्मक रूप से कमजोर करता है। 15 महीने की उम्र में, शारीरिक दंड प्राप्त करने से, पांचवी कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते बच्चे आक्रामक व्यवहार करने लगते हैं।

अभिभावक मानकर चलते हैं कि दंडात्मक व्यवहार बच्चों को नियंत्रित करने का सबसे बेहतर रास्ता है। स्पेअर द रॉड और स्पॉइल द चाइल्ड (डंडे के बिना बच्चे की बर्बादी निश्चित है) की नीति पर यकीन करने वाले सिर्फ भारतीय अभिभावक नहीं हैं। अमेरिका जैसे विकसित देश में भी अभिभावक बच्चों को शारीरिक दंड से अनुशासित करने में विश्वास रखते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक वहां 63 प्रतिशत मामलों में माता-पिता 1-2 साल के बच्चे को शारीरिक सजा देते हैं। अमेरिकी पत्रिका चाइल्ड डिवेलपमेंट में छपी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अक्सर लोग परवरिश को दो ही तरीकों से देखते हैं। अभिभावक या तो बहुत उदार नजर आते हैं या वे अपने बच्चों के साथ बहुत सख्त होते हैं और उन्हें शारीरिक दंड देने से भी नहीं हिचकते।

इसके उलट स्वीडन, फिनलैंड, जर्मनी, पुर्तगाल जैसे यूरोपीय देशों में बच्चों को थप्पड़ मारना भी गैर-कानूनी है। जर्नल करंट बायॉलजी में प्रकाशित एक अध्ययन में विशेषज्ञों ने बताया कि जो बच्चे शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना का शिकार होते हैं उनके दिमाग में ठीक उसी तरह के परिवर्तन देखे जा सकते हैं जैसे युद्ध के दौरान सैनिकों के दिमाग में होते हैं। ऐसे बच्चों के मस्तिष्क में दो हिस्सों इंटीरियर इन्सुला और एमाइग्लाडा में सक्रियता बढ़ जाती है जो उनके भावनात्मक विकास को बाधित करती है और उनको अवसादग्रस्त बनाती है। बच्चों का कोमल मन जब भी किसी प्रकार की आत्मीय हिंसा से प्रताड़ित होता है तो वह स्वयं को अपनों से दूर करने लगता है। अमेरिकन अकैडमी ऑफ पीडियॉट्रिक्स की एक शोध रिपोर्ट ने यह तथ्य उजागर किया कि बच्चे को डांटना, निरंतर उलाहना देना या उसे नीचा दिखाने की पीड़ा और प्रभाव उतने ही गहरे हैं जितने कि शारीरिक प्रताड़ना के।

बिना कारण खोजे बच्चों को सजा देना, समस्या का ऐसा अस्थायी समाधान है जो उन्हें अभिभावकों के समक्ष नियंत्रित व्यवहार करने के लिए तो विवश कर देगा परंतु भीतर ही भीतर उन्हें उग्र और उद्दंड भी बनाएगा। उसके भीतर यह विश्वास घर करने लगेगा कि किसी भी विवाद या समस्या का प्रभावी हल दंडात्मक व्यवहार है। वह समस्याओं को मानवीय, लोकतांत्रिक ढंग से सुलझाने की सकारात्मक सोच से दूर होता चला जाएगा।

हमें यह विश्वास करना होगा कि सतत संवाद ही एकमात्र माध्यम है जिसके जरिए हम अपने बच्चों के सोच-विचार और व्यवहार को सकारात्मक ढंग से प्रभावित कर सकते हैं।

(साई फीचर्स)


डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया इसका समर्थन या विरोध नहीं कराती है।

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