लंबे होते लक्ष्य

बांग्लादेश में अक्षय स्रोत से बिजली उत्पादन बढ़ाने की दिशा में अत्यंत धीमी प्रगति न सिर्फ इसलिए चिंताजनक है कि यह इसे पूर्व निर्धारित मानकों और लक्ष्यों से बहुत पीछे कर दे रही है, बल्कि इसलिए भी दुर्भाग्यपूर्ण और निराशाजनक है कि इससे हम अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धा में भी बहुत पीछे खिसकते जा रहे हैं।

2008 में तय हुआ था कि देश में कुल बिजली उत्पादन का दस प्रतिशत हम अक्षय स्रोतों से हासिल करेंगे और यह काम 2020 तक हो जाना था। इस लक्ष्य और समय सीमा को ध्यान में रखते हुए सरकार ने सौर और पवन ऊर्जा क्षेत्र की कई परियोजनाओं पर देसी-विदेशी निजी निवेशकों के साथ करार भी किए थे। मगर जमीनी हकीकत बता रही है कि हम इस मामले में लक्ष्य से बहुत दूर होते जा रहे हैं। इस विलंब के लिए तमाम कारण गिनाए जा सकते हैं, लेकिन जो सामने आ रहा है, उसके अनुसार तो इसके पीछे चयनित निजी कंपनियों की अक्षमता और अकर्मण्यता ही बड़ा कारण दिखाई दे रहा है।

अब भी समय है कि सरकार इन्हें अंतिम रूप से काम देने के पहले एक बार फिर से समीक्षा कर ले। मसलन उसे यह तो परख लेना ही चाहिए कि किसी प्रोजेक्ट या करार को समय से पूरा करने का इनका पिछला रिकॉर्ड कैसा रहा है? अभी तक कॉरपोरेट दिग्गज बेक्सिम्को ने कुछ हिम्मत दिखाई है, लेकिन हमें रेडीमेड गार्मेंट सेक्टर की ओर से ज्यादा उम्मीद लगानी चाहिए, जिसने हाल ही में सरकार को इस दिशा में कुछ अच्छे प्रस्ताव दिए हैं।

यह अंतरराष्ट्रीय बाजार के अनुकूल भी हैं और प्रतिस्पर्द्धा में हमें मजबूती भी दे सकते हैं। ऊर्जा मंत्री ने भी ठीक ही इशारा किया है कि रेडीमेड गार्मेंट सेक्टर यदि बड़ा लाभ लेना चाहता है, तो उसे देश के बुनियादी ढांचे के विकास में आगे बढ़कर सहयोग करना चाहिए। वैसी परियोजनाओं के बारे में, जो पहले ही आकार ले चुकी हैं, लेकिन उनकी प्रगति संतोषजनक नहीं है, हमें ज्यादा गंभीरता से सोचने की जरूरत है, ताकि उनमें गति लाकर उन्हें समय पर पूरा कराया जा सके और उसका लाभ लिया जा सके। यह जरूरी है कि हम ऐसा माहौल बना सकें कि 2020 में हम उपलब्धियों के बडे़ नतीजे पर खड़े दिखाई दें। (ढाका ट्रिब्यून, बांग्लादेश से साभार)

(साई फीचर्स)



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