कितनी पार्टियां केंद्र में सरकार बनवाएंगी?

 

 

(शशांक राय)

लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान के लिए सोमवार को नामांकन का आखिरी दिन था। अभी चार दिन के बाद यानी नाम वापसी के बाद असल चुनाव प्रचार शुरू होगा। तभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अभी चुनाव प्रचार में उतरे भी नहीं हैं। उनको अपनी सरकार फिर से बनाने के लिए प्रचार में उतरना है। पर उससे पहले देश भर की कई पार्टियों ने खुल कर कहना शुरू कर दिया कि केंद्र में सरकार बनवाने में उनकी बड़ी भूमिका होगी। ओड़िशा के मुख्यमंत्री और बीजू जनता दल के प्रमुख नवीन पटनायक ने दावा किया कि उनकी पार्टी राज्य की सभी 21 लोकसभा सीटों पर जीतेगी और केंद्र में सरकार बनाने में उनकी बड़ी भूमिका रहेगी।

इस तरह का दावा करने वाली पार्टियों की संख्या एक दर्जन है। सब मान रहे हैं कि इस बार के चुनाव में किसी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलेगा यानी लोकसभा त्रिशंकु होगी, जैसी कि 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले 30 साल से हो रही थी। तभी सारे प्रादेशिक क्षत्रप किसी न किसी गठबंधन की सरकार बनाने में अपनी भूमिका देख रहे हैं। ध्यान रहे सरकार बनाने में भूमिका निभाने वाली पार्टियों की भारी भरकम मांगें होती हैं और सरकार में उनका दखल रहता है। गठबंधन की सरकारों में यह कई बार देखा जा चुका है। तभी सवाल है इस बार क्या सचमुच लोकसभा त्रिशंकु होने जा रही है और कई पार्टियों के सहयोग से सरकार बनने जा रही है?

सबसे पहले इस बात पर विचार करने की जरूरत है कि पूर्ण बहुमत की भाजपा की सरकार बनने के बाद पांच साल में ही क्योंकि त्रिशंकु लोकसभा की संभावना देखी जा रही है? असल में पिछले चुनाव में भी किसी को अंदाजा नहीं था कि भाजपा पूर्ण बहुमत हासिल कर पाएगी। इसका कारण यह था कि भाजपा अखिल भारतीय मौजूदगी वाली पार्टी नहीं है। इसलिए उसे पूर्ण बहुमत मिलने का अंदाजा खुद पार्टी के नेताओं को नहीं था। पर पूर्ण बहुमत हासिल करने के बाद भाजपा ने बड़ी तेजी से अपना विस्तार किया है। उसने दक्षिण और पूर्वाेत्तर के उन राज्यों में अपना विस्तार किया है, जहां पर पहले नहीं थी।

पार्टी ने सदस्यता अभियान चलाया था, जिसके बाद दावा किया गया कि उसके दस करोड़ सदस्य बन गए हैं। सो, दस करोड़ सदस्यों वाली और पूरे भारत में मौजूदगी वाली पार्टी बन जाने के बाद भी भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने का अंदाजा लगाया जा रहा है। हालांकि इस बार भाजपा के नेता बहुमत को लेकर पहले से ज्यादा भरोसे में हैं, जबकि प्रादेशिक क्षत्रप त्रिशंकु लोकसभा के भरोसे में हैं। उनको लग रहा है कि भाजपा अब भी सीमित इलाके की पार्टी है और पांच साल के केंद्र सरकार के कामकाज और ज्यादातर राज्यों मे भाजपा की सरकार होने से उसके खिलाफ एंटी इन्कंबैंसी है। इसी आधार पर त्रिशंकु लोकसभा का अंदाजा लगाया जा रहा है।

भाजपा के बहुमत से दूर रह जाने और लोकसभा के त्रिशंकु होने का अनुमान इस बात पर भी आधारित है कि भाजपा जिन राज्यों की मजबूत पार्टी मानी जाती है वहां पहले से वह सर्वाधिक सीटें जीत कर शीर्ष पर है। वह अपनी सीटें अब और नहीं बढ़ा सकती है। उत्तर प्रदेश की 80 में से 71, राजस्थान की 25 में से 25, गुजरात की सभी 26 सीटें, मध्य प्रदेश की 29 में से 26, छत्तीसगढ़ की दस, दिल्ली की सात, झारखंड की 12, हिमाचल व उत्तराखंड की सारी सीटें भाजपा के पास है। वह इन राज्यों में और इजाफा कर ही नहीं सकती है।

इसके उलट उन राज्यों के सारे क्षत्रप और कांग्रेस भी बिल्कुल सिमट गए हैं। यहां से भाजपा को कम होना है और कांग्रेस व दूसरे क्षत्रपों को आगे बढ़ना है। भाजपा इन राज्यों में घटेगी तो उसे उम्मीद है कि पूर्वी और दक्षिण भारत से इसकी भरपाई हो जाएगी पर जितना नुकसान होना है उतनी सीटें मिलने का अंदाजा किसी को नहीं है। इसलिए क्षत्रप अपनी भूमिका देख रहे हैं।

इस बार भाजपा और कांग्रेस दोनों ने प्रयास करके ज्यादा से ज्यादा पार्टियों के साथ गठबंधन बनाया है। इसके बावजूद कई पार्टियां ऐसी हैं, जो किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं। सो, चाहे किसी गठबंधन का हिस्सा हों या नहीं हों, सारे प्रादेशिक क्षत्रप इस बार केंद्र की सरकार में अपनी भूमिका देख रहे हैं। भाजपा के सहयोगी उद्धव ठाकरे और नीतीश कुमार को लग रहा है कि उनकी भूमिका बढ़ेगी तो कांग्रेस के सहयोगी लालू प्रसाद, शरद पवार, स्टालिन, हेमंत सोरेन आदि अपनी भूमिका देख रहे हैं।

दूसरी ओर तटस्थ दिख रहे क्षत्रप जैसे के ममता बनर्जी, चंद्रशेखऱ राव, जगन मोहन रेड्डी, नवीन पटनायक, चंद्रबाबू नायडू आदि नेता अपनी भूमिका बढ़ने की संभावना देख रहे हैं। ये तटस्थ क्षत्रप भी किसी न किसी पार्टी की ओर रूझान दिखाते रहे हैं। पर चुनाव नतीजों के बाद कौन किसके साथ जाएगा, यह नहीं कहा जा सकता है। चुनाव बाद कांग्रेस और भाजपा की सीटों के आधार पर इन क्षत्रपों का रुख बदलेगा।

(साई फीचर्स)

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