जिचि की पैथॉलॉजी रिपोर्ट अन्य शहरों में मान्य नहीं!

 

मुझे शिकायत जिला चिकित्सालय सिवनी से है जहाँ के उपचार सहित अन्य व्यवस्थाओं का भगवान ही मालिक नज़र आता है। आश्चर्यजनक बात यह है कि कलेक्टर के द्वारा लगातार जिला चिकित्सालय का निरीक्षण किये जाने के बाद भी स्थिति में कोई सुधार नहीं दिखायी दे रहा है।

इसमें भी प्रमुख बात यह है कि जिला चिकित्सालय सिवनी की पैथॉलॉजी में करायी गयी जाँच को बाहर के शहरों में सिरे से नकार दिया जाता है और वहाँ पर नयी जाँच करवाये जाने की सलाह दी जाती है। बाहर के शहरों में जाँच करवाये जाने को शायद सही ही माना जा सकता है क्योंकि वहाँ की रिपोर्ट और इस सरकारी अस्पताल की रिपोर्ट में अंतर साफ दिखायी देता है जिसके चलते यह शक होना स्वाभाविक है कि सिवनी में गलत रिपोर्ट थमायी जा रही हैं।

यहाँ गौर करने वाली बात यह भी है कि जैसे शुगर की ही जाँच करवायी जाये तो जिला अस्पताल में बताया जाता है कि मरीज़ के खाली पेट शुगर की रिपोर्ट यदि 90 से 110 के बीच आती है तो ही उसे सामान्य माना जाता है जबकि बाहर दूसरे शहरों में खाली पेट यदि 130 भी शुगर आती है तो उसे सामान्य की ही श्रेणी में रखा जाता है।

इसी तरह खाना खाने के बाद मरीज़ की शुगर के बारे में सिवनी में बताया जाता है कि यह 110 से 140 के बीच आना चाहिये तभी सामान्य मानी जा सकती है लेकिन नागपुर – जबलपुर जैसे अन्य शहरों में इसके बारे में बताया जाता है कि खाना खाने के बाद यदि शुगर 180 भी आती है तो उसे सामान्य की श्रेणी में ही रखा जाता है। सवाल यह है कि यदि बाहर के शहरों में जहाँ तमाम तरह की सुविधाएं भी हैं तो क्या वहाँ सलाह गलत दी जा रही है या फिर सिवनी में ही लोगों खासकर मरीज़ों के बीच भ्रम फैलाकर पैसे ऐंठने का इसे जरिया बना लिया गया है। स्थिति स्पष्ट न होने के कारण कई तरह के सवाल उठना स्वाभाविक ही है।

आवश्यकता इस बात की है कि वास्तविकता को सामने लाया जाना चाहिये ताकि सिवनी के मरीज़ों का उपचार सिवनी में ही सही तरीके से हो सके। गलत उपचार के कारण मरीज़ों को कई तरह के साईड इफेक्ट का सामना करना पड़ता है जिसे मरीज़ समझ नहीं पाता है और संभव है कि उसके आंतरिक अंग क्षतिग्रस्त होते जा रहे हों।

वास्तव में देखा जाये तो सिवनी के मरीज़ जब बाहर से उपचार करवाकर आते हैं तो उन्हें अपेक्षित लाभ मिलना तुरंत आरंभ हो जाता है लेकिन सिवनी में मरीज़ों को उतना लाभ नहीं मिल पाता है। ऐसी स्थिति में क्या यह मान लिया जाये कि जिला चिकित्सालय सिवनी में होने वाली पैथॉलॉजी की जाँच एक औपचारिकता मात्र है और यह मरीज़ की वास्तविक स्थिति को स्पष्ट करने के लिये नाकाफी है।

हालांकि चिकित्सा के क्षेत्र से संबंधित तथ्य होने के कारण इसके कारणों को चिकित्सक ही बेहतर जानते होंगे लेकिन उसका असर कहीं न कहीं उपचार विधि पर अवश्य पड़ता है, इसलिये आवश्यकता इस बात की है कि चिकित्सकों के द्वारा मरीज़ को यह बात अवश्य बतायी जाये कि उनके और अन्य शहरों के उपचार के तरीकों में इतना अंतर क्यों रहता है ताकि संदेह की स्थिति को समाप्त किया जा सके।

आदित्य मिश्रा