तंबाखू नियंत्रण के उपाय

 

 

(शरद खरे)

भारत सरकार के द्वारा तंबाखू पर नियंत्रण के लिये अनेक अधिनियम अस्तित्व में लाये गये हैं। इनका व्यापक प्रचार-प्रसार भी किया जा रहा है। बावजूद इसके तंबाखू उत्पादों पर नियंत्रण न लग पाना अपने आप में आश्चर्य का ही विषय है। इस विषय पर अगर कोई शोध कर ले तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिये।

भारत सरकार के तंबाखू नियंत्रण अधिनियम सिगरेट और अन्य तंबाखू उत्पाद अधिनियम 2003 के तहत धारा चार में सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषेध है। इसके तहत चिकित्सालय, सभागृह, बस स्टैण्ड, रेल्वे स्टेशन, प्रतिक्षालय, मनोरंजन केंद्र, छविगृह, कार्यालय, दुकानों, शिक्षण संस्थानों, रेस्टॉरेंट आदि में धूम्रपान प्रतिबंधित किया गया है।

इतना ही नहीं अट्ठारह साल से कम के बच्चों को तंबाखू उत्पाद बेचना भी गैर कानूनी है। इसके साथ ही साथ शैक्षणिक संस्थाओं से सौ मीटर की परिधि में तंबाखू उत्पाद बेचना प्रतिबंधित है। इस तरह के अनेक प्रावधान सरकारी स्तर पर किये गये हैं। सरकार के द्वारा प्रतिबंध लागू तो कर दिये गये हैं पर इनका पालन सुनिश्चित हो रहा है अथवा नहीं, इसे देखने की फुर्सत किसी को नहीं है।

सिवनी में सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान करने पर, संबंधित विभाग के द्वारा चालान किये जाने का एक भी उदाहरण नहीं मिलता है। ऐसा प्रतीत होता है कि केंद्र सरकार के धूम्रपान विरोधी आदेशों का सिवनी में अक्षरशः पालन हो रहा है तभी तो सिवनी में सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान के बाद भी कोई चालान नहीं किये जाते हैं।

मजे की बात तो यह है कि सिवनी में अनेक सरकारी और गैर सरकारी शालाओं के मुख्य द्वार पर ही बीड़ी सिगरेट सहित पान गुटखों की दुकानें होने के बाद भी जिला प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारियों के द्वारा इन्हें हटाने की दिशा में किसी तरह की कवायद नहीं की जा रही है।

आज का युवा मुँह में पान मसाला या गुटखा ठूंसे दिखायी दे जाता है। शालाओं के परिसर के अंदर भी दीवारें पान गुटखे की पीक से अटी पड़ी हैं। शिक्षक भी मुँह में तंबाखू भरकर लोटा भर-भर कर थूकते नज़र आते हैं। शाला के प्राचार्य भी शिक्षकों या विद्यार्थियों की इन हरकतों पर संज्ञान लेते नहीं दिखते हैं।

आज की युवा पीढ़ी को इस घातक जहर से बचाने के लिये स्वयंसेवी संगठनों के द्वारा भी किसी तरह का अभियान नहीं चलाया जाता है। प्रशासन की कवायद भी महज़ रस्म अदायगी ही मानी जा सकती है। शालाओं के आसपास से पान ठेलों को हटवाने में न तो शिक्षा विभाग को दिलचस्पी है और न ही प्रशासन ही इसमें संज़ीदा दिखता है।

आज का युवा पान गुटखों की जद में फंसकर कैंसर जैसी बीमारियों की जद में फंसता जा रहा है और प्रशासन इस बात के लिये कतई फिकरमंद प्रतीत नहीं होता है। जिला प्रशासन को चाहिये कि कम से कम केंद्र सरकार के तंबाखू विरोधी अधिनियमों का पालन तो सख्ती से सुनिश्चित कराये।