अब आशा महाराष्ट्र की जनता से ही

 

 

 

 

(प्रकाश भटनागर)

न खुदा ही मिला न विसाले सनम….महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन के बाद शिवसेना के लिए इसके अलावा और क्या सोचा जा सकता है।माननापड़ेगा तो शरद पंवार को। कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने मिलकर शिवसेना से अपने-अपने पुराने हिसाब चुकता कर लिए। महाराष्ट्र का राष्ट्रपति शासन न एनसीपी की सेहत पर खास असर डालेगा और न ही कांग्रेस को इससे अधिक दिक्कत होना है। जिस शिवसेना पर यह तुषारापात हुआ है, वह दुम कटी छिपकली की तरह मातोश्री से सुप्रीम कोर्ट के बीच बिलबिलाती दिख रही है। राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करके भगत सिंह कोश्यारी ने गलत कदम नहीं उठाया। शिवसेना कल जब उनके पास पहुंची तो उसने बहुमत की चिट्ठी सौंपने की बजाय समय की मांग कर दी। एनसीपी के पास भी मंगलवार रात आठ बजे तक का समय था, लेकिन उसने भी दोपहर में ही दो दिन का समय और मांग लिया

लिहाजा, राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी। और शाम तक वो लग गया। मतलब यह हुआ कि तीनों एक होने वाले दलों के अपने एजेंडे पहले से सेट थे और उससे समझौता करना उनके लिए भी मुश्किल था। चुनाव नतीजे के अठारह दिन बाद भी यदि समय चाहिए तो समझ लीजिए कि आपमें दम नहीं बचा है। शरदपवार ने तो अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह घड़ी से गजर को निकालकर वहां शिवसेना को लटका- सा दिया। मरहूम बाल ठाकरे के पुत्र और पोते पवार के सामने नतमस्तक होते रहे। पार्टीजनों ने दिल्ली जाकर सोनिया गांधी से जो गुहार लगायी, उसे देखकर यही लगा कि असली मातोश्री मुंबई नहीं, बल्कि दिल्ली स्थित दस जनपथ में है। इस सारी छिछालेदर से भाजपा बड़ी होशियारी के साथ पहले ही निकल गयी। देवेंद्र फडणवीस का इस्तीफा एक सामान्य घटनाक्रम नहीं समझा जाना चाहिए।

भाजपा जिस किस्म की सत्तालोलुप हो चुकी है, उसके चलते यह नहीं सोचा जाना चाहिए था कि पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री ने नैतिकता के आधार पर यह कदम उठाया। भाजपा जब यह समझ चुकी कि शिवसेना नहीं मानेगी, जब उसे यह गाढ़ा अहसास हो गया कि भविष्यवर्ती परिणामों के मद्देनजर एनसीपी और कांग्रेस शायद ही शिवसेना से हाथ मिलाएंगे, तब कहीं जाकर उसने इस्तीफे का खेल खेला। इसके बाद वही हुआ, जिसकी संभावना थी। शिवसेना राष्ट्रपति शासन के खिलाफ सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटा रही है। इस अदालती लड़ाई का हश्र अदालत ही जाने, लेकिन प्रथमदृष्टया यह लगता है कि काले कोट वालों के इस खेल में इस दल के लिए आशा की सफेदी कम ही बची है। कोश्यारी ने नियमानुसार सबसे बड़ दल भाजपा को बहुमत के लिए बुलाया।

शिवसेना की ओर से आदित्य जब राजभवन पहुंचे तो उनके पास भी विधायकों का पूरा समर्थन विधिवत रूप से मौजूद नहीं था। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को भी राजभवन आमंत्रित किया गया। इस सबके बाद राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी। तो जनाब बाल ठाकरे की सियासी विरासत की इस मट्टीपलीद के बाद महाराष्ट्र की चाबी केंद्र सरकार के हाथ में आ गयी है। जाहिर है कि राज्य में उस समय तक राष्ट्रपति शासन रह सकता है, जब तक कि फडणवीस एंड कंपनी को यह अहसास न हो जाए कि उनके अच्छे दिन फिर से आ गये हैं। बाल ठाकरे जीवित होते तो तय मानिये कि वह इस सबके बाद मुख्यमंत्री कार्यालय वाली दिशा में मुंह करके सोना तक बंद कर देते। लेकिन मामला अलग है। ठाकरे के चिरंजीव उद्धव मुंह की खाने के बाद बौखलाए हुए हैं।

बेटे आदित्य की सियासी पारी के आगाज में ही उनके हिस्से मूर्खताजन्य ऐसी नाकामी आयी है कि उन्हें बेहिचक शिवसेना का कांग्रेसी राहुल गांधी कहा जा सकता है। इस दल की जो गत हुई, उसे देखकर दया या हंसी का भाव नहीं उपज रहा। यही लग रहा है कि यदि पंचतंत्र वाले पंडित विष्णु शर्मा आज भी जीवित होते तो वह महाराष्ट्र की इस पार्टी के हश्र की कहानी सुनाकर यही सीख देते कि भूखे को यदि कटोरी ही मिल जाए तो उसे पानी पी-पीकर अपना पेट फोड़ने जैसी नादानी का परिचय नहीं देना चाहिए। मात्र सत्ता के लिए सियासत कर रहे सियासी दलों से कोई अच्छी अपेक्षा करना फिजूल है। हां, महाराष्ट्र की आवाम से कई आशाएं हैं। अगला चुनाव होते समय उसे यह तय करना होगा कि क्या उसे एक बार फिर किसीगठबंधन के लिए जनादेश देकर ऐसी ही राजनीतिक अस्थिरता देखना है। पैसे का भयावह अपव्यय सहन करना है। या फिर उसकी नीयत यह है कि वह किसी एक दल को सरकार बनाने हेतु आवश्यक समर्थन दे दें। यह दल भाजपा सहित शिवसेना, एनसीपी या कांग्रेस कोई भी हो सकता है। लेकिन दल एक ही हो, ताकि लोकतंत्र को राजनीतिक कबड्डी में बदलने वालों की तबीयत ठिकाने लगायी जा सके।

(साई फीचर्स)