मलाई खाते बाहरी चिकित्सक!

 

(शरद खरे)

समाज हो या सरकार, हर जगह व्यवस्था को चलाने के लिये नियम कायदे बनाये गये हैं। समाज में वर्जनाएं तार-तार न हों इसके लिये बुजुर्ग और समाज के प्रतिष्ठित लोगों की उपस्थिति अनिवार्य है। इसी तरह सरकारी नियम कायदों के पालन के लिये केंद्र और राज्य सरकारों के द्वारा अलग-अलग तरीके से व्यवस्थाएं बनायी गयी हैं। ये व्यवस्थाएं केंद्रीय स्तर से लेकर राज्य स्तर तक हैं। इसमें राज्य, संभागीय और जिला स्तरीय विभागों के कार्यालय बनाये गये हैं, जिनमें विभागाध्यक्षों की तैनाती भी की गयी है। इन विभागाध्यक्षों का काम व्यवस्थाओं को नियम कायदों से संचालित और संपादित करने का है।

जिला मुख्यालय में अस्सी के दशक तक सरकारी जिला अस्पताल का संचालन बस स्टैण्ड के बाजू में किया जाता था। इसके बाद सुश्री विमला वर्मा के द्वारा बारापत्थर में विशालकाय भवन के साथ जिला अस्पताल की सौगात दी गयी थी। बीसवीं सदी के अंत तक सरकारी अस्पतालों की व्यवस्थाएं अपेक्षाकृत चाक चौबंद हुआ करती थीं।

इक्कीसवीं सदी के आगाज़ के साथ ही स्वास्थ्य विभाग की सेवाएं पटरी से उतरना आरंभ हुईं। अब तो आलम यह है कि जिले भर में झोला छाप चिकित्सकों के द्वारा बिना किसी भय के मरीज़ों की जेब तराशी जा रही है। इतना ही नहीं सरकारी चिकित्सकों की दुकानें भी स्थान-स्थान पर खुली दिख जाती हैं। नियमानुसार सरकारी चिकित्सक अपने निवास के अलावा अन्य स्थानों पर सशुल्क परामर्श नहीं दे सकते हैं।

चिकित्सकों को जहाँ निज़ि स्तर पर चिकित्सा करना होता है उसके लिये भी नियम कायदे बने हुए हैं। इसके लिये केंद्र सरकार के द्वारा क्लीनिकल एस्टबलिशमेंट एक्ट 2010 में बनाया गया था। अगर कोई चिकित्सक किसी पैथी (आर्युविज्ञान, आयुर्वेद, होम्योपैथी या अन्य विधा) से स्नातक या विशेषज्ञ आदि की उपाधि लेता है तो वह उसी पैथी में उपचार के लिये अधिकृत होता है। इसके साथ ही साथ उसे जिस प्रदेश में वह चिकित्सा कर रहा है वहाँ के मेडिकल एजूकेशन विभाग में अपना पंजीयन कराना अनिवार्य होता है। यही नहीं जिस स्थान पर वह मरीज़ों का परीक्षण कर रहा है उस स्थान के लिये भी उसे संबंधित जिले के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी से अनुमति की आवश्यकता होती है।

विडंबना ही कही जायेगी कि सिवनी में नागपुर एवं अन्य प्रदेशों से सप्ताह में एक दो बार आने वाले अधिकांश चिकित्सकों का न तो प्रदेश में पंजीयन है और न ही उनके द्वारा मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय से ही किसी तरह की अनुमति ली जाती है। इस तरह बाहर से आने वाले चिकित्सक सिवनी में आकर मनमाने तरीके से मरीज़ों का परीक्षण कर उन्हें लूटते नज़र आते हैं। पता नहीं क्यों सीएमएचओ कार्यालय के द्वारा भी इस मामले में दिलचस्पी नहीं ली जाती है।

संवेदनशील जिलाधिकारी का ध्यान चार पाँच माहों से स्वास्थ्य विभाग की ओर दिख रहा है, इसलिये उनसे अपेक्षा की जा सकती है कि इस मामले में वे मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी को जिले के चिकित्सकों की अनुमतियों, उपाधियों आदि की जाँच करें और अगर कोई नियम विरूद्ध तरीके से काम कर रहा है तो उसे दण्डित करवाने की अनुशंसा भी करें।

 

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