कहाँ गये संस्कार और नैतिकता!

 

(शरद खरे)

लंबे समय से बाहूबली चौराहा पूरी तरह अव्यवस्थित ही नज़र आ रहा है। चौराहे पर बेतरतीब खड़े वाहनों, दुकानों के बाहर रखी सामग्री के कारण यातायात व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित होती दिखती है। युवाओं के द्वारा सड़क पर वाहन खड़े कर दिये जाते हैं। इन्हें हटवाना पुलिस की जवाबदेही तो है पर भारतीय सभ्यता, संस्कार और नैतिकता आज कहाँ अदृश्य हो चुकी है इस बारे में भी विचार करने की महती जरूरत है।

देखा जाये कि सभ्यता, संस्कार नैतिकता, अनुशासन ही व्यक्ति को सही मार्ग पर चलने का बोध कराती है। आखिर अनुशासन क्या हैै? अभी प्रौढ़ हो रही पीढ़ी की स्मृतियों में यह बात विस्मृत नहीं हुई होगी कि सुबह उठते ही बुजुर्ग कहा करते थे पहले बाल बांध लो, ओंछ लो (कंघी कर लो), फिर दांत मांझ लो (ब्रश कर लो)। इसके उपरांत नित्य क्रिया और नहा धोकर तैयार होने के बाद ही सारे काम आरंभ किये जाते थे। दरअसल, यही अनुशासन है। हम अनुशासित रहेंगे तो निश्चित तौर पर यह हमारे लिये फायदे का ही सौदा साबित होने वाला है।

भारतीय सभ्यता, संस्कार, नैतिकता और अनुशासन की बातें आज दैनिक जीवन में कम ही दिखायी देती हैं। आज के समय में पाश्चात्य सभ्यता ने युवाओं को पूरी तरह अपने प्रभाव में ले रखा है। आज का युवा कानों में ईयर फोन लगाकर दिन भर मोबाईल पर गाने सुनता रहता है। उसकी इस आदत के कारण वह कुछ ऊँचा सुनने भी लगा है। अगर आप कान में ईयर फोन लगाये हों तो जाहिर है आपकी आवाज भी तेज हो जायेगी। दिन भर गाने, वह भी पाश्चात्य तड़के वाला देशी संगीत सुनने के चलते युवाओं की दैनंदिनी भी बदल चुकी है।

अभी ज्यादा साल नहीं बीते हैं। आज प्रौढ़ हो रही पीढ़ी इस बात को शायद नहीं भूली होगी कि सत्तर से अस्सी के दशक के बीच जब पेट्रोल चलित दो पहिया वाहनों की तादाद कम हुआ करती थी तब शाला जाने का सहारा इकलौती साईकिल ही हुआ करती थी। संपन्न लोगों के हर एक बच्चे के पास साईकिल होती थी, पर मध्यम वर्ग के बच्चे दो या तीन ही साईकिल पर बैठकर शाला आना-जाना किया करते थे।

उस काल में शिक्षण संस्थानों में कतार से खड़ी साईकिल देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो किसी प्रशिक्षित व्यक्ति के द्वारा साईकिल को इस तरह से करीने से खड़ा करवाया गया हो। वास्तव में यही था असली संस्कार, संस्कृति, अनुशासन और सभ्यता का असली नमूना। उस दौर में बच्चों को इस बात का भय हुआ करता था कि अगर उसकी साईकिल को किसी शिक्षक ने बेतरतीब खड़ी देखी तो उस विद्यार्थी को शिक्षक के कोप का भाजन बनना पड़ सकता है।

आज के समय में शालाओं में विद्यार्थियों के द्वारा पेट्रोल चलित दो पहिया वाहनों का जिस तरह से उपयोग किया जा रहा है वह एक तरह से घातक इसलिये भी माना जा सकता है क्योंकि घर से शाला तक विद्यार्थी के वाहन की गति पर कोई अंकुश नहीं होता है। शालाओं में भी जिस तरह से विद्यार्थियों के द्वारा वाहन खड़े किये जाते हैं वे भी बेतरतीब की श्रेणी में माने जा सकते हैं।

बच्चों की यही हरकत शनैः शनैः उनकी आदत में तब्दील हो जाती है और वे जहाँ भी जाते हैं वहाँ वाहनों को इसी तरह से खड़ा करना अपना अधिकार समझने लगते हैं। घर के अंदर भी वाहनों को वे इसी तरह से बेतरतीब तरीके से ही खड़ा करते हैं। पालक भी चुपचाप इसे नियति मानकर ही चलते हैं और बच्चों के हौसले बुलंदी पर आ जाते हैं।

देखा जाये तो बच्चे का प्रथम शिक्षक उसकी माता होेती है और उसका पिता उसका पहला मार्गदर्शक। बच्चों के साथ कड़ाई से पेश आने की बजाय अगर उन्हें बार-बार प्यार से इस बावत समझाया जाये तो इसके अच्छे प्रतिसाद सामने आ सकते हैं, किन्तु पालकों ने भी अपने दायित्वों से मुँह मोड़ रखा है।

वैसे बच्चे तो कच्ची मिट्टी के मानिंद ही होते हैं। कुम्हार के द्वारा जिस तरह कच्ची मिट्टी को चाक पर रखकर उसे सुराही, दिया, गमले आदि का आकार देकर अग्नि में तपाया जाकर उस पर रंग रोगन कर सुंदर बनाया जाता है उसी तरह बच्चों को भी संस्कार, अनुशासन के साथ नैतिकता और सभ्यता का ज्ञान देकर तपाया जाकर उनके भविष्य को सुंदर आकार दिया जा सकता है।

हमारा मानना है कि सिवनी में जिस तरह की घटनाएं पिछले कुछ सालों में घटित हुई हैं उसमें कम आयु के युवाओं की भागीदारी ज्यादा इसलिये है क्योंकि इन बच्चों को संस्कार, संस्कृति, सभ्यता, नैतिकता, अनुशासन आदि का पाठ करीने से नहीं पढ़ाया गया है। कुछ अपवाद छोड़ दिये जायें तो शालाओं में भी शिक्षक इस तरह से शिक्षा देते हैं मानों वे बेगार ही टाल रहे हों। इस तरह से तो बच्चे किसी भी विकृत आकार को अगर ग्रहण कर लें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिये।

आज का युवा जिस तरह से तेजी के साथ अपराध की ओर आकर्षित हो रहा है वह अच्छे संकेत नहीं है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हर पालक इस बारे में विचार करे कि उसके बच्चे के संगी साथी किस मानसिकता के हैं? बच्चा किस तरह के सर्किल में मूव हो रहा है? अंग्रेजी की कहावत है कि ए मेन नोज बाई द कंपनी ही कीप्स, अर्थात आपके इर्द गिर्द के लोगों से ही आपकी पहचान होती है। आज के समय में पालकों को विचार करना ही होगा कि उनके बच्चे आखिर किस दिशा की ओर अग्रसर हैं। अगर इन बच्चों को सही और सकारात्मक दिशा में नहीं लाया गया तो अपराध की अंधी सुरंग में ये बच्चे न जाने किस ठौर पर जाकर रूकेंगे . . .!

3 thoughts on “कहाँ गये संस्कार और नैतिकता!

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