परीक्षाओं के दौरान टेंशन यानी सब गड़बड़

 

जिला प्रशासन मुहैया कराये परीक्षा के लिये बेहतर माहौल

(संजीव प्रताप सिंह)

सिवनी (साई)। परीक्षा का मौसम आरंभ हो चुका हैै। परीक्षाओं में विद्यार्थियों को टेंशन होना स्वाभाविक ही है। परीक्षाओं के मौसम में शादी ब्याह, तीज त्यौहार आदि भी आते – जाते रहते हैं। इस दौरान कानफाड़ू लाउड स्पीकर, डीजे आदि से बच्चों की एकाग्रता भंग होती है।

प्रशासन को चाहिये कि परीक्षाओं के मौसम में इन पर सख्ती से न केवल प्रतिबंध लगाये वरन उस पर अमल हो, यह भी सुनिश्चित करे। परीक्षाओं का सिलसिला आरंभ हो चुका है। यही वह समय है जब विद्यार्थियों को सबसे ज्यादा फोकस की आवश्यकता होती है पढ़ायी पर, मगर इसी समय वे सबसे ज्यादा परेशानी भी झेलते हैं।

दरअसल परीक्षा के इस मुश्किल दौर में सिर्फ विद्यार्थी ही नहीं हमारी भी कुछ नैतिक जिम्मेदारियां बनती हैं, जिन्हें जानकर और समझकर हम बच्चों की पढ़ायी में मदद कर सकते हैं बल्कि, देश का भविष्य गढ़ने में भी हाथ बंटा सकते हैं। परीक्षाओं के दौरान ही शहर में एक प्रदर्शनी को लगाने की अनुमति देना भी आश्चर्य जनक ही माना जा रहा है।

गवर्नमेंट रिस्पॉन्सिब्लिटी : परीक्षाएं केवल बच्चों की नहीं बल्कि हर उस जिम्मेदार की होगी, जिन्हें लॉ एण्ड ऑर्डर को सुव्यवस्थित बनाये रखना होता है। प्रशासन भी परीक्षा के समय में अपनी भूमिका पर खरा उतरे तो उसकी सार्थकता सामने आयेगी। सामुदायिक विवाह स्थलों व ओपन मैरिज गार्डन्स में प्रतिबंधित हों डीजे व लाउड म्यूजिक। धार्मिक त्यौहारों और पर्वों के दौरान निश्चित समय सीमा के बाद न हो हुड़दंग और शोर – शराबा।

सोशल रिस्पॉन्सिब्लिटी : बच्चे समाज का अहम हिस्सा होते हैं। मार्च में जहाँ इनकी परीक्षाएं आरंभ हो रही हैं, वहीं बच्चों के प्रति समाज की भी कुछ जिम्मेदारी बनती है, जिन्हें निभाकर समाज देश का भविष्य संवारने में मदद कर सकता है। मॉर्निंग वॉक के समय पैदल जा रहे स्टूडेंट को परीक्षा केन्द्र तक छोड़ आयें, उनका समय बचेगा। शादी, विवाह जैसे इवेंट्स में डीजे और तेज साउंड सिस्टम न बजायें, छोटी पार्टीज पोस्टपोन्ड कर दें। घरों में शोरगुल, टीवी या म्यूजिक तेज वॉल्यूम पर न सुनें, पड़ोस में अध्ययन कर रहे स्टूडेंट्स का ध्यान भंग हो सकता है।

अपने बच्चों के लिये परिवार और अभिभावक की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। बच्चे दिन – रात मेहनत कर रहे हैं ताकि परीक्षा में वे अपना बेस्ट दे सकें। ऐसे में अभिभावकों को समझना होगा उन्हें क्या, क्या करना है। स्टडी के लिये प्रेशराईज न करें, वे क्षमता के अनुसार ही पढ़ सकते हैं, उम्मीदों के अनुसार नहीं। बच्चों की तुलना न करें, इससे वे डिप्रेशन में आ सकते हैं, उन्हें लगातार मोटिवेट करते रहें, घरों में हेल्दी माहौल बनायें, आपसी झगड़ों और समस्याओं से बच्चों को दूर रखने का प्रयास करें।