अश्लीलता भोजपुरी के माथे का कलंक बन गई

 

 

(ओम प्रकाश)

पिछले कुछ वर्षों में भोजपुरी सिनेमा और मनोरंजन उद्योग अश्लीलता का पर्याय बन गया है। संवादों में द्विअर्थी शब्दों की तो भरमार है ही, गानों का चित्रण पॉर्नाेग्रफी से भी बुरा हो गया है। स्त्रियों को बड़ी बेहूदगी से वस्तु समझा और बनाया जा रहा है। इसका भाषा-साहित्य, समाज और संस्कृति पर बड़ा बुरा असर पड़ रहा है। अभी हाल ही बिहार के सहरसा में कामुकता के पिशाचों ने एक युवा नर्तकी की गोली मार कर हत्या कर दी। उस समय वह पियवा से पहिले हमार रहलू गा रही थी। पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड मिला कर हर साल दर्जनों ऐसी घटनाएं होती हैं।

अश्लीलता के खिलाफ जुलाई 2018 में पूर्वांचल विकास प्रतिष्ठान ने भी एक अभियान शुरू किया। इसमें हम ऑनलाइन दस्तखत करके उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड- तीनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों को अश्लीलता रुकवाने का ज्ञापन भेज रहे थे। यह ज्ञापन हम महिला-बाल विकास और समाज कल्याण मंत्री को भी भेज रहे थे। कल्पना कीजिए उस विद्रूप की कि जिन श्रीमती मंजू वर्मा से हम अश्लीलता रुकवाने की फरियाद कर रहे थे, मुजफ्फरपुर शेल्टर होम कांड में वे खुद अभियुक्त हैं।

मनोरंजन उद्योग की यह गिरावट भोजपुरी सिनेमा से आई और देखते-देखते कैसेट, म्यूजिक एलबम्स, डीजे और ऑर्केस्ट्रा नाचों में जमीन तक पसर गई। लेकिन भोजपुरी फिल्मों में भी गिरावट अपने आप नहीं आई। 1960-62 के दौर में, और फिर 1975-80 के दौर में ये फिल्में ऐसे लोगों द्वारा बनाई गई थीं, जिनकी हिंदी सिनेमा में भी थोड़ी-बहुत पहुंच थी और जिनके मानक हिंदी सिनेमा से ही तय होते थे।

1990-92 में जब भोजपुरी फिल्मों का तीसरा दौर शुरू हुआ तो एक तो उसमें हाथ-पांव मारने के लिए हिंदी सिनेमा के भोजपुरीभाषी निर्माता, निर्देशकों, कलाकारों आदि की भारी तलछट जमा थी और दूसरे, 80-90 के दशक में पूर्वांचल में राजनीति, अफसरशाही, ठेकेदारी और माफिया के गठजोड़ से नवधनाढ्यों की जो पंगत बनी, भोजपुरी फिल्मों के 20-25 लाख की सस्ती लागत में ही बन जाने से उसका भी भोजपुरी फिल्मों की ओर धावा हुआ। ट्रेंड, अनट्रेंड हर तरह के लोग इकठ्ठा हो गए। गुणवत्ता की कमी के कारण इन सभी को सफलता का एक ही फॉर्म्युला मिलादृअश्लीलता, सॉफ्ट पॉर्न और 93-94 आते-आते पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के बाजार गंदे कैसेटों, एलबमों और ऐसी ही फिल्मों और विडियो से भर उठे।

नतीजा यह हुआ कि अच्छे दर्शकों, परिवारों ने भोजपुरी सिनेमा देखने थिएटर जाना बंद कर दिया। स्थिति यह हो गई है कि ये फिल्में, गीत-संगीत सब घोषित तौर पर चवनियां क्लास के लिए गाए-बनाए जाते हैं और इसी घटियापने को समूचे भोजपुरी समाज के माथे पर थोप दिया गया है।

ऐसा नहीं कि सेंसर बोर्ड इस समस्या से कभी अनजान रहा हो। वर्ष 2011 में तत्कालीन अध्यक्ष लीला सैम्सन ने खुद ही आवाज बुलंद की कि भोजपुरी गाने पॉर्नाेग्रफी जैसे हो गए हैं। उनके बाद के अध्यक्ष पहलाज निहलानी ने भी यही बात कही। अब बोर्ड की सदस्य वाणी त्रिपाठी टिक्कू कह रही हैं कि भोजपुरी सिनेमा का सारा का सारा कंटेंट ही चिंता का कारण बन गया है।

लेकिन कार्रवाई? वह कभी नहीं हुई। स्क्रीनिंग समिति में सूचना व प्रसारण मंत्रालय ने राजनीतिक कार्यकर्ताओं या पहुंच-पैरवीवालों को भर दिया है। फिल्में पास कराने के एजेंट्स हैं और बोर्ड के जो बड़े लोग हैं, वे अपने में मगन हैं। पूरे पूर्वांचल में भोजपुरी फिल्मों में फैली अश्लीलता के खिलाफ आंदोलन चल रहा है। लेकिन बोर्ड के मौजूदा अध्यक्ष और उसके माननीय सदस्यों को इतना भी उचित नहीं लगा है कि इस मामले में उनके श्रीमुख से कोई अल्फाज निकलें। तथाकथित सभ्य और संवेदनशील, संस्कृति के पोषक समाज की यह निंदनीय चुप्पी सेंसर बोर्ड को भी अश्लीलता फैलाने के मामले में सह अभियुक्त बना देती है। (लेखक पूर्वांचल विकास प्रतिष्ठान के सचिव हैं)

(साई फीचर्स)