फादर आफ इंडिया पर ऐसा बवाल

 

 

 

 

(प्रकाश भटनागर)

बड़ा बवाल मच गया है। डोनाल्ड ट्रम्प ने नरेंद्र मोदी को फादर आफ इंडियाकह दिया। कांग्रेस उफन-उफनकर इसका विरोध कर रही है। उसका कहना है कि भाईचारा और अहिंसा के रास्ते पर चलने वाले को ही यह खिताब दिया जा सकता है। पार्टी यह भी कह रही है कि कोई विदेशी इस तरह की उपमा देने का हक नहीं रखता है। एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी तो ऐसे बौखलाये कि उन्होंने ट्रम्प को जाहिल कह दिया है। उनका मानना है कि ट्रम्प को न भारतीयता के बारे में ज्ञान है और न ही महात्मा गांधी के। ओवैसी की नजर में अमेरिकी राष्ट्रपति का यह बयान गांधी की तौहीन है। कुल जमा बहस यह कि फादर आफ इंडिया का पैमाना क्या होना चाहिए।

लेकिन क्या वाकई हम ऐसी निरपेक्ष बहस के अभ्यस्त हैं? भारत रत्न को ही लीजिए। देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को यह सम्मान तब दिया गया, जब उनसे पांच पायदान पहले जवाहर लाल नेहरू को इससे नवाजा जा चुका था। जिस आरक्षित वर्ग के सुख-चैन की विरोधी दल सोते-जागते कसम खाते हैं, उसी वर्ग के मसीहा डॉ. बीआर अम्बेडकर को यह सम्मान इंदिरा गांधी के बाद ही प्रदान किया गया। सादगी के प्रतीक रहे पूर्व प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा की तो इस सम्मान के लिए बारी राजीव गांधी के भी बाद आ सकी। यह अलग से बताने की जरूरत नहीं कि सम्मान के क्रम में हुई इस गड़बड़ी का श्रेय तत्कालीन कांग्रेस सरकारों के खाते में जाता है।

मोहनदास करमचंद गांधी को राष्ट्रपिता मानने के लिए मेरा कभी भी समर्थन नहीं रहा। अस्तु उनके बारे में यहां और अधिक लिखना पूर्वाग्रह का प्रतीक प्रतीत हो सकता है। इससे अलग मैं यह कहना चाहूंगा कि इस देश में अधिकांश सम्मान और उपमाएं न जाने कब का अपना महत्व खो चुके हैं। उनके महत्व को धूल-धूसरित किया गया है। देशद्रोह के आरोपी कन्हैया कुमार को महान देशभक्त कहने वालों की कमी नहीं है तो रेपिस्ट आसाराम और गुरमीत राम-रहीम सिंह की पूजा करने वाले आज भी हमारे आसपास आसानी से देखने मिल जाते हैं।

भारत माता को डायन कहने वाले मोहम्मद आजम खान आज भी कुछ देशवासियों के हृदय में निवास कर रहे हैं और हम इस बात को भी आंख मूंदकर स्वीकार ले रहे हैं कि फिरोज गांधी के पोते राहुल खालिस ब्राह्मण हैं। कहने का आशय यह कि वर्तमान दौर व्यक्तियों सहित घटनाओं के संदर्भ में व्यापक तौर पर बिखरी हुई विचारधाराओं के बीच संघर्ष का है। सोशल मीडिया इनका सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म बन चुका है। आप किसी को पसंद करें तो सौ लोग उसके खिलाफ बरछी-भाले लेकर यहां हाजिर हो जाएंगे। कोई अन्य किसी का समर्थन करे तो आप भी विरोध में पगे हुए कमेंट लेकर वहां अपनी उपादेयता साबित करने का प्रयास करने लगेंगे। यह बहस निरर्थक है।

ट्रम्प ने मोदी को जो कहा, वह भारतीय जनतंत्र की भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं करता है, ठीक उसी तरह, जिस तरह राजीव गांधी को भारत रत्न देना उस जनता की सहमति का परिचायक नहीं है, जो आज भी इस पूर्व प्रधानमंत्री का जिक्र करते समय बोफोर्स कांड, शाहबानो प्रकरण और श्रीलंका में निर्दोष भारतीय सैनिकों (इंडियन पीस कीपिंग फोर्स) की निर्मम हत्या आदि का जिक्र करना नहीं भूलता है। क्या भारत रत्न जैसा खिताब कभी इस चर्चा पर विराम लगा सका है कि वह नेहरू ही थे, जिनके चलते देश आज भी पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर का दंश झेल रहा है? मोदी से देश की जनता खुश है या नहीं, यह किसी चुनाव में ही पता चल सकता है। किसी डोनाल्ड ट्रम्प का कथन इसमें कोई खास भूमिका अदा नहीं करेगा। इसलिए ऐसे मसले पर जुबानी जमा खर्च करने से बेहतर है कि न तो मोदी के अंध-विरोध का परिचय दिया जाए और न ही उनके अंध-भक्त होने जैसा जुनून जाहिर हो। जहां तक फादर आॅफ इंडिया की बात है, तो यह देश की उसी आवाम पर छोड़ दें, जिसने किसी समय भावुकता की आंधी में बहकर राजीव गांधी तो कभी सशक्त विकल्प की जरूरत के चलते नरेंद्र मोदी के तौर पर प्रदान किया है।

(साई फीचर्स)